वैश्विक कृषि पर ईरान युद्ध का प्रभाव
परिचय
ईरान के साथ जारी युद्ध ने वैश्विक कृषि को काफी हद तक प्रभावित किया है, मुख्य रूप से गैस और उर्वरक आपूर्ति में व्यवधान के कारण। ये व्यवधान काफी हद तक तेहरान द्वारा होर्मुज जलडमरूमध्य को लगभग पूरी तरह से बंद करने के कारण हैं, जिससे दुनिया भर के किसान, विशेष रूप से विकासशील देशों के किसान प्रभावित हुए हैं।
उर्वरक की कमी और इसके परिणाम
- होर्मुज जलडमरूमध्य वैश्विक उर्वरक व्यापार के लगभग एक-तिहाई हिस्से को संभालने वाला एक महत्वपूर्ण मार्ग है।
- पौधों की वृद्धि के लिए आवश्यक नाइट्रोजन और फॉस्फेट बुरी तरह प्रभावित हुए हैं। यूरिया जैसे नाइट्रोजन उर्वरकों की ढुलाई में देरी हो रही है और तरलीकृत प्राकृतिक गैस की बढ़ती कीमतों के कारण इनकी लागत भी बढ़ गई है।
- इस कमी से विकासशील देश सबसे ज्यादा प्रभावित होते हैं, जिससे पैदावार कम होने और फसल खराब होने का खतरा बढ़ जाता है।
क्षेत्रीय प्रभाव
- भारत: सरकार घरेलू उर्वरक आपूर्ति को प्राथमिकता देती है और निर्माताओं को प्राकृतिक गैस की पर्याप्त सहायता प्रदान करती है। हालांकि, कुछ संयंत्र अभी भी अपनी क्षमता से कम पर चल रहे हैं।
- अफ्रीका: उर्वरकों की कमी गंभीर समस्या है, खासकर मौसम की अनिश्चितताओं के कारण। पूर्वी अफ्रीका में मक्के की पैदावार घट सकती है, जिससे खाद्य सुरक्षा प्रभावित हो सकती है।
- वैश्विक स्तर पर: किसानों को कम उर्वरक वाली फसलों पर विचार करने या उर्वरक के उपयोग को कम करने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है, जिससे पैदावार कम हो सकती है और खाद्य पदार्थों की कीमतें बढ़ सकती हैं।
आर्थिक और सुरक्षा संबंधी चिंताएँ
- संघर्ष समाप्त होने के बाद होर्मुज जलडमरूमध्य से होकर गुजरने वाले माल के लिए बीमा लागत में वृद्धि होने की उम्मीद है।
- चीन और रूस जैसे प्रमुख उर्वरक उत्पादक देश घरेलू आपूर्ति को प्राथमिकता दे रहे हैं, जिससे वैश्विक निर्यात सीमित हो रहा है।
सरकारी हस्तक्षेप
- किसानों को सहायता प्रदान करने में सब्सिडी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है, लेकिन इससे कृषि क्षेत्र में दीर्घकालिक विकास के लिए निवेश सीमित हो सकता है।
- भारत ने इस वर्ष यूरिया सब्सिडी के लिए 12.7 बिलियन डॉलर आवंटित किए हैं, लेकिन यूरिया का अत्यधिक उपयोग मिट्टी की गुणवत्ता को नुकसान पहुंचाता है।
संभावित समाधान
- घरेलू उर्वरक उत्पादन को बढ़ावा देने और जैविक विकल्पों के उपयोग से आयात पर निर्भरता कम हो सकती है।
- कृषि-पारिस्थितिक पद्धतियों को अपनाने से ऊर्जा की कीमतों में उतार-चढ़ाव और जलवायु संबंधी चुनौतियों के प्रभाव को कम किया जा सकता है।
उर्वरक संकट वैश्विक खाद्य प्रणालियों की नाजुकता को रेखांकित करता है, जो टिकाऊ कृषि पद्धतियों और बेहतर आपूर्ति श्रृंखला लचीलेपन की आवश्यकता पर जोर देता है।