उच्चतम न्यायालय ने कहा कि अनिवार्य मासिक धर्म अवकाश महिलाओं के करियर को प्रभावित कर सकता है | Current Affairs | Vision IAS

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In Summary

  • अनिवार्य सवैतनिक मासिक धर्म अवकाश की मांग वाली एक रिट याचिका का निपटान करते हुए, उच्चतम न्यायालय ने स्वैच्छिक नीतियों का स्वागत किया।
  • यह महिलाओं को मासिक धर्म के दौरान होने वाली परेशानी और स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं (जैसे डिसमेनोरिया, एंडोमेट्रियोसिस आदि) के लिए दिया जाने वाला अवकाश (सवैतनिक या अवैतनिक) है।
  • कार्यक्षमता में सुधार: हालांकि, कार्यस्थल पर उत्पादकता पर ध्यान दिया जाता है, लेकिन अवकाश मिलने से महिला कर्मचारी की कार्यक्षमता और रिकवरी में सुधार हो सकता है।

In Summary

अनिवार्य सवैतनिक मासिक धर्म अवकाश की मांग वाली एक रिट याचिका का निपटान करते हुए, उच्चतम न्यायालय ने स्वैच्छिक नीतियों का स्वागत किया। हालांकि न्यायालय ने इसे कानून के माध्यम से अनिवार्य बनाने के खिलाफ चेतावनी दी।

मासिक धर्म अवकाश के बारे में

  • यह महिलाओं को मासिक धर्म के दौरान होने वाली परेशानी और स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं (जैसे डिसमेनोरिया, एंडोमेट्रियोसिस आदि) के लिए दिया जाने वाला अवकाश (सवैतनिक या अवैतनिक) है।

मासिक धर्म अवकाश के लाभ

  • कार्यक्षमता में सुधार: हालांकि, कार्यस्थल पर उत्पादकता पर ध्यान दिया जाता है, लेकिन अवकाश मिलने से महिला कर्मचारी की कार्यक्षमता और रिकवरी में सुधार हो सकता है।
  • मौजूदा कानूनों के अनुरूप: उपजीविकाजन्य सुरक्षा, स्वास्थ्य और कार्यदशा संहिता, 2020, संविधान के अनुच्छेद 42 के तहत "न्यायसंगत एवं मानवीय कार्य परिस्थितियों" को अनिवार्य बनाती है।
  • हीन भावना को समाप्त करना: यह लैंगिक समानता को बढ़ावा देने और मासिक धर्म के स्वास्थ्य से संबंधित सामाजिक एवं सांस्कृतिक वर्जनाओं को कम करने में मदद करता है।

प्रमुख मुद्दे और चुनौतियां

  • अनौपचारिक क्षेत्रक: भारत के लगभग 88% कार्यबल को रोजगार देने वाले इस क्षेत्रक में कोई औपचारिक अवकाश ढांचा मौजूद नहीं है।
  • कार्यस्थल की संरचनात्मक प्रतिकूलता: यह अवकाश इस धारणा पर आधारित हो सकता है कि कार्यस्थल मासिक धर्म के दौरान महिलाओं के लिए प्रतिकूल हैं (जैसे हीटिंग सुविधाओं या उचित शौचालयों का अभाव)।
  • रोजगार बाजार की वास्तविकता: महिलाओं के लिए सकारात्मक कार्रवाई को संवैधानिक रूप से मान्यता प्राप्त है। हालांकि, अनिवार्य अवकाश का प्रावधान महिलाओं को संभावित नियोक्ताओं के लिए कम आकर्षक बना सकता है, जिससे उनके करियर को नुकसान हो सकता है।
  • लैंगिक रूढ़िवादिता को बढ़ावा: मातृत्व लाभ और क्रेच (शिशु गृह) सुविधाओं जैसे पहले से मौजूद दायित्वों के साथ, यह प्रावधान भर्ती के दौरान भेदभाव का जोखिम बढ़ा सकता है।

मौजूदा मासिक धर्म अवकाश नीतियां

  • भारत: वर्तमान में कोई केंद्रीय कानून नहीं है। हालांकि, कुछ राज्यों में इस संबंध में नीतियां हैं।
    • बिहार (1992 में लागू करने वाला पहला राज्य), केरल (2023), ओडिशा (2024), और कर्नाटक (2024) में नीतियां लागू हैं।
  • वैश्विक स्तर: इंडोनेशिया, जापान, दक्षिण कोरिया, आयरलैंड और इटली जैसे देशों में इस तरह की नीतियां मौजूद हैं।
  • निजी क्षेत्रक: जोमैटो (Zomato), स्विगी (Swiggy), बायजूस (BYJU’s) जैसी निजी कंपनियों ने ऐसी नीतियां अपनाई हैं।
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लैंगिक रूढ़िवादिता (Gender Stereotyping)

यह उन पूर्वाग्रहों और रूढ़ियों को संदर्भित करता है जो पुरुषों और महिलाओं की भूमिकाओं और क्षमताओं को सीमित करते हैं, और जो कार्यस्थल में भेदभाव को बढ़ा सकते हैं, जैसे कि महिलाओं को मातृत्व या अन्य 'स्त्री' जिम्मेदारियों से जोड़ना।

सकारात्मक कार्रवाई (Affirmative Action)

यह वंचित समूहों, विशेष रूप से महिलाओं, को ऐतिहासिक अन्याय और भेदभाव से उबरने में मदद करने के लिए डिज़ाइन की गई सरकारी नीतियों और पहलों को संदर्भित करता है, जिसमें रोजगार और शिक्षा में कुछ लाभ शामिल हो सकते हैं।

अनौपचारिक क्षेत्रक (Informal Sector)

आर्थिक गतिविधियों का वह हिस्सा जो सरकारी नियमों, श्रम कानूनों और कर प्रणालियों के दायरे से बाहर है। ई-अपशिष्ट प्रबंधन में, इसमें छोटे पैमाने के पुनर्चक्रणकर्ता और डीलर शामिल हैं।

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