RBI की एक रिपोर्ट में भारत में जनसांख्यिकीय संक्रमण और राज्य वित्त पर इसके प्रभावों को रेखांकित किया गया | Current Affairs | Vision IAS
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In Summary

  • रिपोर्ट में भारत के जनसांख्यिकीय परिवर्तन पर प्रकाश डाला गया है, जिसमें औसत आयु 28 वर्ष है, और यह परिवर्तन राज्यों की जनसंख्या की आयु संरचना के आधार पर उन्हें अलग-अलग तरह से प्रभावित करता है।
  • वृद्ध राज्यों को घटते कर आधार और बढ़ते प्रतिबद्ध व्यय जैसी राजकोषीय चुनौतियों का सामना करना पड़ता है, जिसके लिए 'सिल्वर इकोनॉमी' का दोहन करने जैसी नीतियों की आवश्यकता होती है।
  • राज्यों का समेकित सकल राजकोषीय घाटा 2024-25 में जीडीपी के 3.3% तक बढ़ गया, जबकि बकाया देनदारियां जीडीपी के 28% तक कम हो गईं।

In Summary

भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) की इस रिपोर्ट का शीर्षक है- 'राज्य वित्त: 2025-26 के बजटों का अध्ययन’। यह रिपोर्ट राज्य सरकारों की राजकोषीय स्थिति का व्यापक विश्लेषण भी प्रस्तुत करती है।

भारत में जनसांख्यिकीय संक्रमण से संबंधित रिपोर्ट के मुख्य बिंदुओं पर एक नजर

  • महत्वपूर्ण दौर: भारत में जनसंख्या की औसत आयु 28 वर्ष है। साथ ही, कार्यशील आयु वाली आबादी वर्तमान में अपने ऐतिहासिक शिखर पर है।
  • राज्यों की स्थिति
    • युवा आबादी वाले राज्य: बिहार, उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में युवा आबादी की हिस्सेदारी अधिक है। इससे उनके पास विकास का एक बड़ा अवसर मौजूद है।
    • मध्य आयु की आबादी वाले राज्य: तेलंगाना, उत्तराखंड जैसे राज्यों में यह अवसर धीरे-धीरे कम हो रहा है।
    • वृद्ध होती आबादी वाले राज्य: केरल, तमिलनाडु जैसे राज्य जनसांख्यिकीय मोड़ को पार कर चुके हैं। ऐसे राज्यों में कार्यशील आयु वाली आबादी का हिस्सा कम होने लगा है।

जनसांख्यिकीय संक्रमण के राज्यों पर राजकोषीय प्रभाव

  • संकुचित होता कर आधार: वृद्ध होती आबादी वाले राज्यों में श्रम बल की कमी हो रही है। इससे दीर्घकालिक संवृद्धि दर कम हो जाएगी, जिससे कर आधार में कमी होगी। साधारण शब्दों में कर देने वाले लोगों की संख्या घट जाएगी। 
  • बढ़ता हुआ प्रतिबद्ध व्यय: वृद्ध होती आबादी वाले राज्यों पर पेंशन और ब्याज भुगतान जैसे खर्चों का भारी दबाव है।
    • 2024-25 में, इन राज्यों ने अपने सामाजिक क्षेत्रक के खर्च का लगभग 30% हिस्सा केवल पेंशन पर आवंटित किया था।
  • राजकोषीय सुभेद्यता: वृद्ध होती आबादी वाले राज्यों का GSDP (सकल राज्य घरेलू उत्पाद) की तुलना में ऋण अनुपात और राजस्व प्राप्तियों की तुलना में ब्याज भुगतान का अनुपात काफी अधिक है।

नीतिगत सुझाव

  • युवा आबादी वाले राज्यों के लिए: युवा आबादी को उत्पादक कार्यबल में बदलने के लिए शिक्षा, कौशल विकास और स्वास्थ्य में भारी निवेश करना अनिवार्य है।
  • मध्य आयु की आबादी वाले राज्यों के लिए: भविष्य हेतु सामाजिक सुरक्षा और स्वास्थ्य देखभाल बफर (Buffers) बनाते हुए संवृद्धि को बढ़ावा देने वाले निवेश की दोहरी रणनीति अपनानी चाहिए।
  • वृद्ध होती आबादी वाले राज्यों के लिए: कामकाजी जीवन में वृद्धि करके, जीवन प्रत्याशा के अनुरूप सेवानिवृत्ति की आयु बढ़ाकर और बुजुर्गों के लिए लचीली कार्य व्यवस्था को बढ़ावा देकर "सिल्वर इकोनॉमी" का लाभ उठाना चाहिए।

रिपोर्ट के अन्य मुख्य बिंदुओं पर एक नजर

  • राज्यों का समेकित सकल राजकोषीय घाटा (GFD): पिछले लगातार तीन वर्षों तक 3% से नीचे रहने के बाद, 2024-25 में यह बढ़कर GDP का 3.3% हो गया है।
  • राज्यों का राजस्व व्यय: इसमें निरंतर गिरावट देखी गई है। यह 2020-21 में GDP के 15% से घटकर 2024 -25 में 13.3% रह गया है।
  • राज्यों की समेकित बकाया देनदारियां: मार्च 2021 में 31% के उच्च स्तर से घटकर, मार्च 2024 के अंत में यह GDP का 28% रह गई हैं।
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समेकित बकाया देनदारियां (Consolidated Outstanding Liabilities)

यह केंद्र और राज्य सरकारों की कुल संयुक्त देनदारियों या ऋणों का योग है। यह सरकार की वित्तीय स्थिति का एक महत्वपूर्ण संकेतक है।

राजस्व व्यय (Revenue Expenditure)

यह सरकार का वह व्यय है जो दिन-प्रतिदिन के कार्यों को चलाने के लिए किया जाता है और जिससे किसी स्थायी संपत्ति का निर्माण नहीं होता, जैसे वेतन, पेंशन, सब्सिडी और ब्याज भुगतान।

समेकित सकल राजकोषीय घाटा (Consolidated Gross Fiscal Deficit - GFD)

यह केंद्र और राज्य सरकारों के संयुक्त राजकोषीय घाटे को संदर्भित करता है, जो सरकार के कुल व्यय और गैर-ऋण प्राप्तियों के बीच का अंतर है। यह सरकार के उधार लेने की आवश्यकता का एक माप है।

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