उत्तर-पश्चिमी भारत में कृषि संबंधी बदलाव
किसानों के निर्णय और फसलों में बदलाव
हरियाणा के सिरसा जिले के किसान रमेश चंद्र अपनी खेती की रणनीति में महत्वपूर्ण बदलाव कर रहे हैं। वे इस वर्ष बाजरे की खेती को बढ़ाकर 14 एकड़ कर रहे हैं, जो 2025 में नौ एकड़ और 2024 में दो एकड़ थी। यह वृद्धि कपास की खेती में कमी के कारण हो रही है, जिसे उन्होंने 2024 में 23 एकड़ से घटाकर इस वर्ष संभवतः मात्र एक एकड़ कर दिया है।
कपास से कृषि की ओर बदलाव के कारण
- कीटों का खतरा: गुलाबी बॉलवर्म, या गुलाबी सुंडी, ने कपास की पैदावार को बुरी तरह प्रभावित किया है, जिससे पैदावार 10-12 क्विंटल प्रति एकड़ से घटकर हाल ही में मात्र 3.5 क्विंटल रह गई है।
- श्रम की कमी: कपास की तुड़ाई के लिए उच्च श्रम लागत, जो 12 रुपये से 25 रुपये प्रति किलोग्राम तक होती है, और उपज की अनिश्चितता के कारण कपास कम आकर्षक हो जाती है।
- रासायनिक इनपुट की लागत: कपास की खेती में उर्वरकों और कीटनाशकों सहित महत्वपूर्ण रासायनिक इनपुट की आवश्यकता होती है, जो गुलाबी बॉलवर्म के खिलाफ अप्रभावी होते हैं।
बाजरा एक विकल्प के रूप में
कपास की तुलना में बाजरा के कई फायदे हैं:
- कम उर्वरक के उपयोग से अधिक पैदावार (18-20 क्विंटल/एकड़)।
- कपास के लिए 5-7 बार की तुलना में कम सिंचाई की आवश्यकता होती है (केवल 1-2 बार)।
- रोपण में लचीलापन होने के कारण सरसों और मूंग जैसी अतिरिक्त फसलें भी उगाई जा सकती हैं।
बाजार और समर्थन संबंधी चुनौतियाँ
बाजरा की बाजार में कीमत कम होने के बावजूद, चंदर जैसे किसान न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) के माध्यम से सरकार से आश्वासन चाहते हैं ताकि बाजरा एक व्यवहार्य विकल्प बन सके। वर्तमान में प्राप्त प्रभावी दर आधिकारिक MSP से कम थी।
अंतर्राष्ट्रीय तनावों का उर्वरक आपूर्ति पर प्रभाव
पश्चिम एशिया में मौजूदा भू-राजनीतिक तनाव, विशेष रूप से अमेरिका-इजराइल बनाम ईरान संघर्ष, धान और मक्का जैसी फसलों के लिए महत्वपूर्ण उर्वरकों की उपलब्धता को खतरे में डालता है, जो बाजरा की तुलना में अधिक उर्वरक-गहन फसलें हैं।
बाजरे की क्षमता
संयुक्त राष्ट्र ने 2023 को बाजरा का अंतर्राष्ट्रीय वर्ष घोषित किया, जिसमें कम पोषक तत्वों, कीटनाशकों और पानी की आवश्यकता के संदर्भ में बाजरा के लाभों पर प्रकाश डाला गया। अंतर्राष्ट्रीय तनाव और जलवायु परिस्थितियों के कारण यह बदलाव 2026 को बाजरा को अपनाने के लिए एक महत्वपूर्ण वर्ष के रूप में उजागर कर सकता है।
यह सारांश उत्तर-पश्चिम भारत के किसानों के सामने आने वाली चुनौतियों और रणनीतिक निर्णयों की रूपरेखा प्रस्तुत करता है, जिसमें आर्थिक और पर्यावरणीय कारकों के कारण कपास से बाजरा की ओर बदलाव पर जोर दिया गया है, और भविष्य की कृषि पद्धतियों में बाजरा की संभावित भूमिका पर प्रकाश डाला गया है।