भारत की रक्षा विनिर्माण क्षमताएं और चुनौतियां
भारत के रक्षा विनिर्माण परिदृश्य का अवलोकन
रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने ऑपरेशन सिंदूर के माध्यम से युद्ध में तकनीकी प्रगति के भारत के रणनीतिक उपयोग पर प्रकाश डाला। इसका उद्देश्य भविष्य के युद्धों में प्रतिस्पर्धात्मक बढ़त बनाए रखने के लिए तकनीकी परिवर्तनों के साथ तेजी से तालमेल बिठाना है।
वर्तमान स्थिति और चुनौतियाँ
- आयात पर निर्भरता: घरेलू तकनीकी सीमाओं और बजटीय बाधाओं के कारण भारत शीर्ष दस हथियार आयातकों में से एक बना हुआ है।
- ऐतिहासिक संदर्भ: प्रारंभ में ब्रिटेन और बाद में सोवियत संघ से आयात पर निर्भर रहने वाला भारत, अब अपनी खरीद का दायरा बढ़ाकर उसमें अमेरिका और इज़राइल को भी शामिल कर चुका है।
- चीन से तुलना: समान शुरुआत के बावजूद, स्वदेशी रक्षा विनिर्माण में भारत की तुलना में चीन ने काफी प्रगति की है।
- खरीद संबंधी चुनौतियाँ: अत्यधिक केंद्रीकरण और प्रक्रियात्मक देरी भारत की रक्षा खरीद प्रक्रिया में प्रमुख बाधाएँ हैं।
- प्रतिभा प्रतिधारण: सरकारी संस्थानों में अपर्याप्त वेतन शीर्ष इंजीनियरिंग और वैज्ञानिक प्रतिभाओं की भर्ती को प्रभावित करता है।
उभरती प्रौद्योगिकियां और युद्ध
- युद्ध की बदलती प्रकृति: हाल के संघर्ष आधुनिक युद्ध में ड्रोन जैसी लागत प्रभावी प्रौद्योगिकियों की महत्वपूर्ण भूमिका को दर्शाते हैं।
- ड्रोन की रणनीतिक प्रासंगिकता: क्षेत्रीय संघर्षों में ड्रोन प्रभावी साबित हुए हैं, जैसे कि ईरान द्वारा अमेरिकी प्रतिष्ठानों के खिलाफ की गई कार्रवाई।
- उभरती प्रौद्योगिकियों में निवेश: रणनीतिक तैयारियों के लिए भारत को यूएवी, स्वायत्त प्रणालियों और उन्नत वायु रक्षा में अपनी क्षमताओं को मजबूत करने की आवश्यकता है।
निजी क्षेत्र की भूमिका
- रणनीतिक साझेदारी मॉडल: प्रमुख रक्षा प्लेटफार्मों के लिए भारतीय निजी कंपनियों और विदेशी OEM के बीच सहयोग को सुविधाजनक बनाने की पहल जारी है।
- प्रत्यक्ष विदेशी निवेश उदारीकरण: रक्षा क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की सीमा को बढ़ाकर 74% कर दिया गया है, जिससे संयुक्त उद्यमों और प्रौद्योगिकी हस्तांतरण को बढ़ावा मिलेगा।
- रक्षा क्षेत्र के उपक्रमों का प्रभुत्व: रक्षा विनिर्माण में अभी भी 70% से अधिक हिस्सेदारी रक्षा सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों की है, जो निजी कंपनियों के लिए चुनौतियां पेश करती है।
- संतुलित पारिस्थितिकी तंत्र का निर्माण: भारत के रक्षा विनिर्माण विकास के लिए एक संकर मॉडल आवश्यक है जहां सार्वजनिक और निजी दोनों क्षेत्र निष्पक्ष शर्तों पर सहयोग और प्रतिस्पर्धा करते हैं।