ऊर्जा रणनीति और भू-राजनीतिक संदर्भ
एक मजबूत ऊर्जा रणनीति जो उन्नत जैव ईंधन , क्रमिक विद्युतीकरण और बुनियादी ढांचे और लचीले ईंधन परिवेश में निवेश को एकीकृत करती है, एक संधारणीय, लचीला, अनुकूलनीय और आत्मनिर्भर ऊर्जा ढांचा बनाने के लिए महत्वपूर्ण है।
भू-राजनीतिक तनाव और ऊर्जा निर्भरता
- पश्चिम एशिया में तनाव: हालिया भू-राजनीतिक तनाव वैश्विक ऊर्जा संरचना में मौजूद कमजोरियों को उजागर करते हैं।
- भारत की निर्भरता: भारत अपने कच्चे तेल का लगभग 85% आयात करता है, जिससे यह वैश्विक ऊर्जा व्यवधानों के प्रति संवेदनशील हो जाता है।
- आर्थिक प्रभाव: इन व्यवधानों से व्यापक आर्थिक तनाव उत्पन्न होता है, जिसमें निम्नलिखित शामिल हैं:
- मुद्रास्फीति के दबाव
- राजकोषीय असंतुलन
- चालू खाता घाटे में वृद्धि
ऊर्जा मांग और रणनीतिक विविधीकरण
- अनुमानित वृद्धि: नीति आयोग का अनुमान है कि आने वाले दशकों में भारत की ऊर्जा मांग में तेजी से विस्तार होगा।
- आपूर्ति संबंधी अनिश्चितताएं: बढ़ती मांग से वैश्विक आपूर्ति संबंधी अनिश्चितताओं का खतरा बढ़ जाता है।
- ऐतिहासिक भेद्यता: पश्चिम एशिया में अतीत की अस्थिरता के कारण कच्चे तेल की कीमतों में तीव्र वृद्धि हुई, जिससे आयात पर निर्भरता कम करने की आवश्यकता और भी बढ़ गई।
रणनीतिक साधन के रूप में इथेनॉल मिश्रण
एथेनॉल ब्लेंडिंग: भारत के ऊर्जा परिवर्तन में एक नीतिगत साधन और रणनीतिक उपकरण दोनों के रूप में देखा जाता है, जो निम्नलिखित पर केंद्रित है:
- घरेलू क्षमता
- पर्यावरण प्राथमिकताएँ
- विकास प्राथमिकताएँ