भारतीय अदालतों में देरी: चुनौतियाँ और समाधान
शगुन सूर्यम और लवीश भंडारी द्वारा लिखित यह विश्लेषण भारतीय अदालतों में होने वाली देरी की गंभीर समस्या और इसके आर्थिक प्रभावों पर केंद्रित है। ये देरी कानूनी व्यवस्था में एक बड़ी बाधा है, जिससे निवेश में कमी और व्यावसायिक लागत में वृद्धि जैसे आर्थिक नुकसान होते हैं, और संभावित रूप से भारत के सकल घरेलू उत्पाद (GDP) के 1.5 से 2 प्रतिशत तक प्रभावित हो सकते हैं।
विलंब के कारण
- कानूनों का खराब निर्माण और कर्मचारियों की अपर्याप्त संख्या।
- अपर्याप्त बुनियादी ढांचा और अप्रचलित पद्धतियां।
- पेशेवर प्रशासनिक सहायता की कमी के कारण न्यायाधीशों पर प्रबंधकीय कार्यों का बोझ बढ़ जाता है।
प्रशासनिक सुधार की दिशा में प्रयास
प्रशासनिक अक्षमताओं को दूर करने के प्रयास 13वें वित्त आयोग (2010-2015) से ही शुरू हो गए थे, जिसने न्यायाधीशों पर बोझ कम करने के लिए न्यायालय प्रबंधकों के एक समर्पित कैडर की स्थापना की सिफारिश की थी।
कार्यान्वयन संबंधी चुनौतियाँ
- इस पहल के लिए ₹300 करोड़ आवंटित किए गए थे, लेकिन इसका केवल एक छोटा प्रतिशत (लगभग 13%) ही उपयोग किया गया।
- हरियाणा, तमिलनाडु, पंजाब और राजस्थान जैसे राज्यों ने कोर्ट मैनेजर नियुक्त किए, फिर भी 2015 तक केवल 128 पद ही भरे जा सके।
- न्यायाधीशों के प्रतिरोध और भूमिकाओं के अस्पष्ट होने से इस पहल की प्रभावशीलता और भी कम हो गई।
- नियुक्त व्यक्तियों में न्यायिक आवश्यकताओं के प्रति व्यावसायिक अनुभव का अभाव।
नव गतिविधि
सर्वोच्च न्यायालय ने मई 2025 में इस मुद्दे पर फिर से विचार किया और पहले के निर्देशों के लागू न होने पर चिंता व्यक्त की। इसने उच्च न्यायालयों को सेवा नियमों को अद्यतन करने का निर्देश दिया और राज्य सरकारों को अनुमोदन के लिए एक समय सीमा दी।
आगे रास्ता
न्यायालय प्रबंधकों का एक सशक्त और स्थायी दल गठित करना तथा न्यायिक एवं प्रशासनिक कार्यों का स्पष्ट पृथक्करण सुधार के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। इससे न्यायाधीश न्यायनिर्णय पर ध्यान केंद्रित कर सकेंगे और डिजिटलीकरण जैसे अन्य सुधारों का अधिकतम लाभ उठा सकेंगे।
निष्कर्ष: सर्वोच्च न्यायालय ने एक ढांचा प्रदान किया है; अब चुनौती राज्यों और उच्च न्यायालयों के लिए इन परिवर्तनों को स्थायी रूप से संस्थागत रूप देने की है।