भू-राजनीतिक उथल-पुथल और अमेरिकी कार्रवाइयां
नए साल में भी ट्रंप प्रशासन द्वारा शुरू की गई भू-राजनीतिक उथल-पुथल की झलक जारी है। महत्वपूर्ण कार्रवाइयों में शामिल हैं:
- अमेरिका द्वारा वेनेजुएला में किया गया गैर-कानूनी हस्तक्षेप।
- दक्षिण अमेरिका में सत्ता परिवर्तन को उकसाने की धमकियां।
- ग्रीनलैंड को अपने कब्जे में लेने की योजनाएं।
अमेरिकी विधायी और प्रतिबंधात्मक उपाय
आगामी अमेरिकी विधायी चर्चाओं और प्रतिबंधों में निम्नलिखित शामिल हैं:
- एक प्रस्तावित कानून जिसके तहत रूस से तेल या यूरेनियम खरीदने वाले देशों पर 500% तक का टैरिफ लगाया जा सकता है।
- प्रदर्शनकारियों पर ईरान की कार्रवाई के कारण उसके खिलाफ प्रतिबंध और बयानबाजी में वृद्धि हुई है।
- ईरान के साथ व्यापार करने वाले देशों के साथ व्यापार पर 25% का अतिरिक्त शुल्क लगाने का प्रस्ताव।
भारत पर प्रभाव
निम्नलिखित तरीकों से देखा जा सकता है कि अमेरिकी दबाव भारत की रणनीतियों को प्रभावित करता है:
- भारत से आग्रह किया गया है कि वह चाबहार बंदरगाह पर अपने महत्वपूर्ण निवेश के बावजूद परिचालन बंद कर दे।
भारत की प्रतिक्रिया और रणनीतिक विचार
इन वैश्विक दबावों के प्रति भारत की प्रतिक्रिया संयमित और रणनीतिक प्रतीत होती है:
- विदेश मंत्रालय ने वेनेजुएला के बारे में "गहरी चिंता" व्यक्त की, लेकिन अमेरिका की कार्रवाई की निंदा करने से परहेज किया।
- क्यूबा और कोलंबिया को होने वाले खतरों के संबंध में कोई बयान नहीं दिया गया, क्योंकि इनका भारत पर सीधा प्रभाव नहीं पड़ता है।
ईरान पर भारत का रुख
ईरान को लेकर भारत का रुख उल्लेखनीय रूप से सतर्क है:
- ईरान के विरोध प्रदर्शनों या अमेरिका की धमकियों पर जनता की ओर से कोई प्रतिक्रिया न आना।
- ईरान और इज़राइल के लिए यात्रा संबंधी सलाह जारी करना और ईरान में फंसे भारतीय नागरिकों के लिए निकासी योजना तैयार करना।
- ईरान के साथ व्यापार को और कम करने की योजना।
सामरिक स्वायत्तता और द्विपक्षीय संबंध
भारतीय सरकार का दृष्टिकोण अतीत के अनुभवों के बावजूद अमेरिका के साथ रणनीतिक संबंधों को प्राथमिकता देने वाला प्रतीत होता है:
- द्विपक्षीय व्यापार समझौते और उच्च-प्रौद्योगिकी साझेदारी 'पैक्स सिलिका' जैसे समझौतों के माध्यम से भारत-अमेरिका संबंधों में सुधार की उम्मीद है।
- यह स्वीकार करना कि वैश्विक शक्तियों को खुश करने से राष्ट्रीय हितों की रक्षा की गारंटी नहीं मिलती; रणनीतिक स्वायत्तता का दावा करना महत्वपूर्ण है।
निष्कर्ष
इन भू-राजनीतिक तनावों के बीच भारत को संभावित आर्थिक और प्रतिष्ठा संबंधी जोखिमों का सामना करना पड़ रहा है, विशेष रूप से ब्रिक्स+ शिखर सम्मेलन की मेजबानी करने के उद्देश्य से। 2019 का अनुभव इस बात पर प्रकाश डालता है कि भारत को बाहरी दबावों के आगे झुकने के बजाय अपनी रणनीतिक स्वायत्तता पर जोर देना चाहिए।