तमिलनाडु के नीलगिरि जिले में जंगल में लगी आग
नीलगिरि जिले और उससे सटे मुदुमलाई, कोयंबटूर और इरोड के वन प्रभागों में बार-बार जंगल में आग लगने की घटनाएं होती हैं। ये आग इतनी गंभीर हो गई हैं कि भारतीय वायु सेना की सहायता की आवश्यकता पड़ रही है। हालांकि, ये आग भीषण होती हैं, लेकिन ये एक मौसमी घटना का हिस्सा हैं।
प्रमुख प्रभावित क्षेत्र
- पार्सन्स घाटी
- पायकारा
- सिंगारा और मासिनागुडी पर्वत श्रृंखलाएँ
- वेनलॉक डाउन्स
जंगल की आग में योगदान देने वाले कारक
- मौसमी पैटर्न: फरवरी से मई तक का समय आग लगने का मौसम माना जाता है।
- मौसम संबंधी परिस्थितियाँ: अत्यधिक गर्मी और तेज हवाएँ आग लगने के लिए अनुकूल वातावरण बनाती हैं।
- भौगोलिक चुनौतियां: खड़ी ढलान वाले भूभाग और सीमित सड़क संपर्क अग्निशमन प्रयासों में बाधा डालते हैं।
- मानवीय गतिविधियाँ:
- जनजातियों द्वारा लकड़ी इकट्ठा करना।
- चारे की पैदावार बढ़ाने के लिए चरवाहों द्वारा घास जलाना।
- धूम्रपान से संबंधित फेंके गए सामान जैसी आकस्मिक वजहें।
- कथित उपद्रवी गतिविधि: वन प्रबंधन को लेकर शिकायतों के कारण जानबूझकर आग लगाने का संदेह।
जलवायु कारक
जलवायु परिवर्तन के अलावा, जलवायु परिवर्तनशीलता ने बुनियादी जोखिमों को बढ़ा दिया है। गर्म और शुष्क ग्रीष्म ऋतुएं आग की स्थितियों को और भी बदतर बना देती हैं, जिससे अग्निशमन योजनाओं के लिए चुनौतियां खड़ी हो जाती हैं।
अग्नि प्रबंधन के प्रयास
- नियंत्रण कक्ष और अग्निशमन रेखाएं स्थापित करने के साथ ही मार्च में योजना का कार्य शुरू हो गया था।
- मानव बस्तियों से दूर जानवरों के लिए पानी की उपलब्धता सुनिश्चित करना।
- खरपतवार नियंत्रण और जागरूकता अभियान चलाए गए।
अग्नि प्रबंधन में चुनौतियाँ
आग लगने के जोखिम वाली कई गतिविधियाँ आजीविका और पारंपरिक प्रथाओं से जुड़ी होती हैं, जिनके लिए दीर्घकालिक योजना और टिकाऊ प्रबंधन के लिए विकल्पों की आवश्यकता होती है।