भारतीय रिज़र्व बैंक द्वारा पॉलिमर नोटों की शुरुआत
भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) करेंसी नोटों की बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए पॉलीमर नोटों को प्रचलन में लाने पर विचार कर रहा है। पटना और मुंबई में हाल ही में हुई RBI बोर्ड की बैठकों में इस पहल पर चर्चा की गई।
पॉलिमर बैंकनोटों के फायदे
- लागत-प्रभावशीलता: कागज के नोटों की तुलना में पॉलिमर नोटों का उत्पादन अधिक लागत-प्रभावी होता है।
- बढ़ी हुई शेल्फ लाइफ: इनकी शेल्फ लाइफ लंबी होती है, जिससे बार-बार बदलने की आवश्यकता कम हो जाती है।
- गंदे नोटों का निपटान: गंदे नोटों के निपटान की आवश्यकता एक महत्वपूर्ण विचारणीय विषय है, वित्त वर्ष 2025 में 23.8 अरब गंदे नोटों का निपटान किया गया।
वर्तमान मुद्रा सांख्यिकी
- उत्पादन लागत: RBI ने वित्त वर्ष 2025 में कागजी मुद्रा की छपाई पर ₹6,372.8 करोड़ खर्च किए, जो पिछले वर्ष के ₹5,101.4 करोड़ से अधिक है।
- प्रचलन में मुद्रा (CIC): 15 मई तक, CIC में साल-दर-साल 11.5% की वृद्धि हुई और यह ₹42.86 ट्रिलियन तक पहुंच गई।
- मूल्यवर्ग की मांग: ₹10 और ₹20 जैसे कम मूल्यवर्ग के नोटों की उच्च मांग है, हालांकि प्रचलन में उनका हिस्सा कम है।
ऐतिहासिक संदर्भ और अंतर्राष्ट्रीय अनुभव
- पूर्व प्रयास: 2012 में, तकनीकी चुनौतियों के कारण पॉलिमर नोटों को पेश करने की योजना को स्थगित कर दिया गया था।
- तकनीकी प्रगति: हाल के घटनाक्रमों ने इन चुनौतियों का समाधान किया है, जिससे पॉलिमर नोटों के साथ ATM की अनुकूलता संभव हो पाई है।
- वैश्विक स्वीकृति: 60 से अधिक देशों ने पॉलिमर बैंकनोटों को अपनाया है, जिनमें ऑस्ट्रेलिया 1988 में ऐसा करने वाला पहला देश था।
निष्कर्ष
RBI का पॉलिमर नोटों की ओर बढ़ना वैश्विक रुझानों के अनुरूप है और इसका उद्देश्य प्रचलन में मौजूद मुद्रा की दक्षता और स्थायित्व में सुधार करना है, साथ ही पिछली चुनौतियों को दूर करने के लिए तकनीकी प्रगति का लाभ उठाना है।