यह आदेश अमेरिकी एजेंसियों और विभागों को 35 गैर-संयुक्त राष्ट्र संगठनों तथा 31 संयुक्त राष्ट्र संस्थाओं में भागीदारी और वित्त-पोषण बंद करने का निर्देश देता है।
- अमेरिका के अनुसार, ये संस्थाएं अमेरिकी राष्ट्रीय हितों, सुरक्षा, आर्थिक समृद्धि या संप्रभुता के विपरीत कार्य करती हैं।
- इससे पहले भी अमेरिका पेरिस जलवायु समझौते, WHO (विश्व स्वास्थ्य संगठन) और संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद (UNHRC) से हट चुका है।
वे महत्वपूर्ण संगठन जिनसे अमेरिका हट रहा है:
- संयुक्त राष्ट्र के संगठन: जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्र फ्रेमवर्क कन्वेंशन (UNFCCC), व्यापार और विकास पर संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन (UNCTAD), शांति निर्माण आयोग, जलवायु परिवर्तन पर अंतर-सरकारी पैनल (IPCC), पारंपरिक हथियारों का संयुक्त राष्ट्र रजिस्टर आदि।
- गैर-संयुक्त राष्ट्र संगठन: अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा मंच (IEF), अंतर्राष्ट्रीय सौर गठबंधन (ISA), अंतर्राष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ (IUCN), 24/7 कार्बन-फ्री एनर्जी कॉम्पैक्ट आदि।
अमेरिका के हटने के संभावित प्रभाव
- जलवायु परिवर्तन: इससे ग्रीनहाउस गैसों को कम करने के वैश्विक प्रयासों में बाधा उत्पन्न होगी। ऐसा इसलिए है, क्योंकि इससे अन्य देशों को अपनी प्रतिबद्धताओं व कार्रवाइयों में देरी करने का बहाना मिल सकता है।
- बहुपक्षवाद का विखंडन: अमेरिका के हटने से अंतर्राष्ट्रीय शासन व्यवस्था कमजोर होगी, देशों के बीच प्रतिद्वंद्विता बढ़ेगी तथा विश्व संरक्षणवाद एवं छोटे क्षेत्रीय गुटों की ओर झुकेगा।
- विकास में बाधा: अमेरिका ने ऐतिहासिक रूप से वैश्विक संस्थाओं में एक प्रमुख भूमिका निभाई है। साथ ही, अमेरिका के हटने के बाद वित्त-पोषण में कटौती से पहले से ही कम हो रही अंतर्राष्ट्रीय मानवीय एवं विकास सहायता की स्थिति और खराब हो जाएगी।
- वैश्विक शांति: शांति निर्माण आयोग में अमेरिकी योगदान की अनुपस्थिति से संघर्षग्रस्त क्षेत्रों (जैसे अफ्रीका या कैरिबियन) में शांति प्रयास बाधित होंगे।