यह रिपोर्ट ‘इंडिया जस्टिस रिपोर्ट’ द्वारा जारी की गई है। इसका उद्देश्य भारत में उपभोक्ता विवाद निवारण आयोगों की क्षमता और प्रदर्शन का आकलन करना है।
रिपोर्ट के मुख्य बिंदुओं पर एक नजर
- लंबित मामलों का बढ़ता बोझ: कोविड महामारी के बाद उपभोक्ता मामलों के निस्तारण दर में सुधार हुआ है। कुल 7.64 लाख मामलों में से 88.5% का निस्तारण हुआ। इसके बावजूद, 2020 से 2024 के बीच कुल लंबित मामलों में 21% की वृद्धि दर्ज की गई।
- यह उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 के तहत निर्धारित समय-सीमा से बहुत अधिक है, जो मामला दर्ज होने के तीन से पांच महीने के भीतर निस्तारण अनिवार्य करता है।
- वैकल्पिक विवाद-निवारण उपायों का कम उपयोग (ADR): 23 राज्यों के उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, पूरे देश में केवल 134 मामलों को मध्यस्थता के लिए भेजा गया।
- महिलाओं का कम होता प्रतिनिधित्व: 14 राज्य उपभोक्ता आयोगों (SCDRCs) में अध्यक्षों और सदस्यों के रूप में महिलाओं की हिस्सेदारी 2021 की औसतन 35% से घटकर 2025 में 29% रह गई।
- रिक्तियों की अधिक संख्या: 2025 तक, लगभग 50% राज्य उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग (SCDRCs) में अध्यक्ष का पद रिक्त था।
भारत में उपभोक्ता विवाद निवारण तंत्र
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