भारतीय विधायी प्रक्रिया में व्यवधान
अखिल भारतीय अध्यक्ष सम्मेलन में केंद्रीय गृह मंत्री ने लोकतंत्र में बहस की आवश्यकता पर बल दिया तथा विधान सभाओं और संसद में वर्तमान व्यवधानों पर प्रकाश डाला।
संसदीय कार्यप्रणाली की वर्तमान स्थिति
- विपक्ष के विरोध के कारण बार-बार स्थगित होने से विधायी गतिरोध उत्पन्न हो गया है।
- हाल ही में 32 दिनों तक चले सत्र में 21 बैठकें हुईं, जिनमें से 15 विधेयक न्यूनतम बहस के साथ पारित कर दिए गए।
- PRS लेजिस्लेटिव रिसर्च द्वारा किये गए विश्लेषण से पता चलता है:
- लोकसभा अपने निर्धारित समय का केवल 29% ही कार्य कर सकी।
- राज्य सभा अपने निर्धारित समय का 34% कार्य कर सकी।
- निर्धारित समय का दो-तिहाई हिस्सा स्थगन के कारण नष्ट हो गया।
- लोकसभा में केवल 8% तारांकित प्रश्नों के मौखिक उत्तर दिये गये तथा राज्यसभा में केवल 5% तारांकित प्रश्नों के मौखिक उत्तर दिये गये।
शक्ति की शिथिलता और एकाग्रता
- प्रभावी प्रश्नकाल के अभाव से कार्यकारी जवाबदेही कम हो गई है।
- प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्रियों में सत्ता का संकेन्द्रण विधायी निष्क्रियता में योगदान देता है।
राज्य विधान सभाओं का कामकाज
- राज्य कानूनों की 2024 वार्षिक समीक्षा के अनुसार:
- वर्ष 2024 में राज्य विधान सभाओं की बैठक औसतन 20 दिन हुई, जो वर्ष 2017 में 28 दिन थी।
- उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश में केवल 16 बैठक दिवस दर्ज किये गये।
- ओडिशा और केरल क्रमशः 42 और 38 दिनों के साथ सबसे आगे हैं।
- आधे से अधिक विधेयक उसी दिन पारित कर दिए गए जिस दिन उन्हें पेश किया गया था, वह भी न्यूनतम बहस के साथ।
सुधार के लिए सिफारिशें
- सार्थक विधायी बहस के लिए सरकार और विपक्ष के बीच सहभागिता आवश्यक है।
- किसी विपक्षी नेता को लोक सभा का उपाध्यक्ष चुनना एक सकारात्मक कदम हो सकता है।