COP 30 और जलवायु अनुकूलन में बदलाव
2025 में ब्राजील के बेलेम में आयोजित COP 30 सम्मेलन ने जलवायु अनुकूलन में एक महत्वपूर्ण बदलाव लाया, जिसमें जल को एक मुख्य घटक के रूप में शामिल किया गया। सम्मेलन में मापने योग्य जलवायु लचीलेपन पर जोर दिया गया, जिसमें जल, स्वच्छता और स्वास्थ्य (WASH) को वैश्विक अनुकूलन संकेतकों में एकीकृत किया गया।
महत्वपूर्ण मुद्दे
- जल की महत्वपूर्ण भूमिका: जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को बाढ़, सूखा और अनियमित मौसम पैटर्न जैसी जल-संबंधी घटनाओं के माध्यम से सबसे प्रत्यक्ष रूप से महसूस किया जाता है।
- कृषि और मीथेन उत्सर्जन: कृषि मीथेन उत्सर्जन में महत्वपूर्ण योगदान देती है, जिसके लिए कुशल जल उपयोग और मजबूत स्वच्छता प्रणालियों की आवश्यकता होती है।
बेलेम अनुकूलन संकेतक
- जलवायु परिवर्तन के अनुकूल जल प्रणालियाँ: जल की कमी को कम करने, सुरक्षित पेयजल सुनिश्चित करने और स्वच्छता अवसंरचना को बढ़ाने पर ध्यान केंद्रित करना।
- जोखिम प्रबंधन: बहु-खतरा प्रारंभिक चेतावनी प्रणालियों का विकास और बेहतर जल-मौसम विज्ञान सेवाएं।
भारत का रुख और कार्रवाई
भारत जल प्रबंधन में सक्रिय कदम उठा रहा है, जिसमें जल शक्ति मंत्रालय और जल विजन 2047 जैसी पहलें बेलेम के ढांचे के अनुरूप हैं।
- भूजल प्रबंधन: NAQUIM कार्यक्रम जलभृत स्तर के प्रबंधन पर जोर देता है।
- नदी पुनर्जीवन: स्वच्छ गंगा राष्ट्रीय मिशन जलवायु अस्थिरता से निपटने के लिए विभिन्न पहलुओं को एकीकृत करता है।
चुनौतियाँ और अवसर
- प्रणालीगत जोखिम: जल संकट, अनुकूलन वित्तपोषण की कमजोरी और डिजिटल विखंडन महत्वपूर्ण चुनौतियां पेश करते हैं।
- डेटा और प्रणालियों का एकीकरण: भारत प्रभावी निर्णय लेने के लिए जल विज्ञान संबंधी डेटा को एकीकृत करने हेतु अपने डिजिटल बुनियादी ढांचे का लाभ उठा सकता है।
निष्कर्ष
भारत में अनुकूलन को व्यापक स्तर पर क्रियान्वित करने और महत्वाकांक्षा को मापने योग्य लचीलेपन में बदलने की क्षमता है। कार्यान्वयन में न्यायसंगत और मजबूत तकनीकी समाधानों पर ध्यान केंद्रित किया जाना चाहिए, साथ ही मिशन, मापदंड और वित्त को तेजी से एकीकृत करने की दृष्टि भी होनी चाहिए।