उपर्युक्त संस्थानों को जैव विविधता अधिनियम 2002 के तहत राष्ट्रीय भंडार (National Repository) के रूप में अधिसूचित किया गया है।
- कोच्चि के 'समुद्री सजीव संसाधन एवं पारिस्थितिकी केंद्र' (CMLRE) में स्थित "भवसागर" रेफरल सेंटर में 3,500 से अधिक वर्गिकीय रूप से पहचाने गए और भू-संदर्भित वाउचर नमूने मौजूद हैं।
- अगरकर अनुसंधान संस्थान (पुणे) को MACS सूक्ष्मजीव संग्रह और राष्ट्रीय कवक संवर्धन संग्रह के लिए नामित किया गया है।
- जैव विविधता अधिनियम के तहत, यह भंडार:
- जैविक नमूनों को सुरक्षित रूप से संरक्षित करेगा,
- गहरे समुद्र की खोजी गई नई प्रजातियों के संरक्षक के रूप में कार्य करेगा, और
- संयुक्त राष्ट्र महासागर-विज्ञान दशक (2021-2030) के अनुरूप गहरे समुद्र के जीवों की वर्गिकी में विशेषज्ञता सुनिश्चित करेगा।
- जैव विविधता अधिनियम के तहत, यह भंडार:
गहरे समुद्र (Deep Sea) के बारे में

- परिभाषा: यह महासागर के उन क्षेत्रों को दर्शाता है जो 200 मीटर से अधिक गहरे होते हैं, जो ट्वाइलाइट ज़ोन से लेकर वितलीय मैदान (abyssal plains) और गहरे समुद्री नितल तक फैले होते हैं।
- यह पृथ्वी पर प्राचीनतम और सबसे बड़ा बायोम है, जो पृथ्वी के जीवन-योग्य स्थान का लगभग 90-95% हिस्सा है।
समुद्री पर्यावरण की रक्षा करने वाले वैश्विक ढांचे
- संयुक्त राष्ट्र समुद्री विधि अभिसमय (UNCLOS): यह समुद्री पर्यावरण की रक्षा करने और समुद्री संसाधनों के न्यायसंगत उपयोग को प्रबंधित करने के लिए वैश्विक विधिक व्यवस्था है।
- जैव विविधता अभिसमय (CBD): यह अभिसमय जैव विविधता के संरक्षण, इसके घटकों के संधारणीय उपयोग और आनुवंशिक संसाधनों से प्राप्त लाभों के न्यायसंगत साझाकरण को बढ़ावा देता है।
- सतत विकास लक्ष्य (SDG)-14: यह "जलीय जीवन" के संरक्षण पर ध्यान केंद्रित करता है।
- खुला समुद्र संधि यानी हाई सीज ट्रीटी: इसे राष्ट्रीय क्षेत्राधिकार से परे जैव विविधता (BBNJ) समझौता भी कहा जाता है। यह कानूनी रूप से बाध्यकारी संधि है। यह संधि राष्ट्रों के अधिकार क्षेत्र के बाहर के जलीय पारितंत्र की रक्षा करती है।