वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति श्रृंखलाओं की अनिश्चितता और भारत में ईंधन की बढ़ती कीमतों के समाधान के रूप में विकेंद्रीकृत जैव ऊर्जा प्रणालियाँ एक बेहतर विकल्प प्रस्तुत करती हैं।
विकेंद्रीकृत जैव ऊर्जा प्रणालियों के बारे में
- इसका आशय जैविक अपशिष्ट और फसल अवशेषों से स्थानीय स्तर पर विद्युत, ऊष्मा या बायोगैस का उत्पादन और खपत से है।
- शामिल प्रमुख प्रौद्योगिकियां:
- बायोमास गैसीकरण: इस प्रक्रिया में शुष्क कृषि अवशेषों (जैसे भूसा, डंठल आदि) को जलने वाली (दहनशील) गैस में बदला जाता है। फिर इसका उपयोग छोटे इंजन चलाने या उद्योगों में ऊष्मा (हीट) उत्पन्न करने के लिए किया जाता है।
- बायोगैस और एनारोबिक डाइजेशन: यह गीले अपशिष्टों (जैसे भोजन के बचे हुए टुकड़े, पशुओं के गोबर) को खाना पकाने और विद्युत उत्पन्न करने वाली बायोगैस में बदलता है।
- महत्व:
- अपशिष्ट प्रबंधन: जैव ऊर्जा प्रणालियां शहरी ठोस अपशिष्ट और खेतों के अवशेषों को मूल्यवान संसाधनों में बदलती हैं।
- ऊर्जा सुरक्षा: जैव-ऊर्जा प्रणालियां दूरदराज और अविकसित क्षेत्रों में ऑफ-ग्रिड तथा माइक्रो-ग्रिड के माध्यम से बिजली और ऊर्जा उपलब्ध कराने में मदद करती हैं।
- आर्थिक विकास: ये प्रणालियां स्थानीय स्तर पर रोजगार सृजन को बढ़ावा देती हैं तथा लघु पैमाने पर कृषि कार्य व MSME के संचालन में योगदान देती हैं।
जैव ऊर्जा को बढ़ावा देने हेतु प्रमुख पहलें
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