भारत में संघवाद की चुनौतियों का समाधान आम सहमति बनाने में निहित है | Current Affairs | Vision IAS

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  • अरविंद सुब्रमणियन और देवेश कपूर की पुस्तक 'ए सिक्स्थ ऑफ ह्यूमैनिटी' भारत के संघवाद के सामने आने वाली चुनौतियों पर प्रकाश डालती है, जिसमें क्षेत्रीय प्रदर्शन में भिन्नता और टकरावपूर्ण संघवाद शामिल हैं।
  • चिंताओं में लोकसभा में प्रतिनिधित्व के स्थिर रहने और राज्यपाल की सहमति शक्तियों द्वारा स्पष्ट किए गए बढ़ते केंद्रीकरण के कारण लोकतांत्रिक कमी शामिल है।
  • प्रस्तावित समाधानों में सरकारिया आयोग की सिफारिशों को लागू करना, समान विकास को बढ़ावा देना और अंतर-राज्य परिषद और जीएसटी परिषद जैसी संस्थाओं के माध्यम से आम सहमति को बढ़ाना शामिल है।

In Summary

पूर्व मुख्य आर्थिक सलाहकार (CEA) अरविंद सुब्रमण्यन और देवेश कपूर द्वारा लिखित पुस्तक 'ए सिक्स्थ ऑफ ह्यूमैनिटी: इंडिपेंडेंट इंडियाज डेवलपमेंट ओडिसी' भारत में संघवाद को लेकर बढ़ती चिंताओं को रेखांकित करती है। साथ ही, ‘आम सहमति के निर्माण’ को इन चिंताओं के समाधान के रूप में प्रस्तुत करती है।

भारत में संघवाद के समक्ष मुख्य चुनौतियां

  • क्षेत्रीय विकास में असमानता: दक्षिणी और पश्चिमी राज्यों ने उत्तरी राज्यों की तुलना में आर्थिक रूप से अधिक तेजी से विकास किया है। इससे क्षेत्रीय असमानताएं बढ़ी हैं।
    • उदाहरण के लिए: विकसित राज्यों को लगता है कि बेहतर आर्थिक प्रदर्शन करने के लिए उन्हें दंडित किया जा रहा है, क्योंकि राज्यों के आर्थिक योगदान और वित्त आयोग से मिलने वाले धन (अंतरण) के बीच अंतर बढ़ता जा रहा है।
  • टकरावपूर्ण संघवाद: केंद्र सरकार द्वारा एकपक्षीय निर्णय लेने की प्रवृत्ति बढ़ने से परामर्श आधारित और सहकारी संघवाद कमजोर हुआ है। इससे केंद्र और राज्यों के बीच विश्वास में कमी आई है।
    • उदाहरण के लिए: वर्ष 2020 में केंद्र सरकार द्वारा कृषि कानून बनाना, जबकि कृषि भारतीय संविधान की सातवीं अनुसूची के अनुसार राज्य सूची का विषय है।
  • लोकतांत्रिक प्रक्रिया कमजोर होना: जनसंख्या नियंत्रण करने वाले राज्यों को नुकसान से बचाने के लिए लोकसभा में प्रतिनिधित्व को 1971 की जनगणना के आधार पर स्थिर रखा गया है। इससे मूल संविधान में निर्धारित लोकतांत्रिक सुधार प्रभावित हो रहे हैं।
  • केंद्रीकरण के बढ़ते मामले: अनुच्छेद 200 के तहत राज्यपाल द्वारा विधेयकों की स्वीकृति देने से संबद्ध शक्तियों का अनुचित उपयोग किया जा रहा है, विशेषकर उन राज्यों में जहां केंद्र से अलग दल की सरकार सत्ता में होती है।

संघवाद को सुदृढ़ करने हेतु प्रमुख पहलें

  • अंतरराज्यीय परिषद: इसका गठन अनुच्छेद 263 के तहत किया जाता है। इसका उद्देश्य केंद्र और राज्यों के बीच समन्वय को बढ़ावा देना है। 
  • GST परिषद: इसका गठन संविधान के अनुच्छेद 279A के तहत किया गया है। इसमें केंद्र और राज्यों, दोनों के प्रतिनिधि शामिल होते हैं। इसका उद्देश्य जीएसटी नीतियों को तय करना है। 
  • अन्य पहलें: 
    • केंद्र सरकार के करों को राज्यों के बीच क्षैतिज हस्तांतरण (horizontal Tax devolution)  के लिए 16वें वित्त आयोग ने एक सूत्र तैयार किया है। इसमें 10% क्षैतिज हस्तांतरण का आधार GDP में राज्यों का योगदान है।  
    • 73वें और 74वें संविधान संशोधन के माध्यम से स्थानीय निकायों को सशक्त बनाकर शासन के तीसरे स्तर की व्यवस्था स्थापित की गई है।

संघवाद को बढ़ावा देने के उपाय 

  • सरकारिया आयोग की सिफारिशों (1983) को लागू करना: कराधान को छोड़कर अन्य सभी अवशिष्ट शक्तियों (Residuary Powers) को समवर्ती सूची (Concurrent List) में स्थानांतरित किया जाए।
  • समान विकास को बढ़ावा देना: जैसा कि पुंछी आयोग (2007) द्वारा सिफारिश की गई है।
  • प्रमुख संस्थानों के माध्यम से आम सहमति बनाना: जैसे कि अंतरराज्यीय परिषद, जीएसटी परिषद, नीति (NITI) आयोग आदि।
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पुंछी आयोग (Poonchhi Commission)

भारत सरकार द्वारा 2007 में नियुक्त आयोग, जिसने केंद्र-राज्य संबंधों के विभिन्न पहलुओं की समीक्षा की और संघवाद को मजबूत करने हेतु कई सिफारिशें दीं।

समवर्ती सूची (Concurrent List)

सातवीं अनुसूची में शामिल सूची, जिसके तहत आने वाले विषयों पर केंद्र सरकार (संघ) और राज्य सरकारें दोनों कानून बना सकती हैं। विवाह, तलाक, बच्चे को गोद लेना और उत्तराधिकार जैसे विषय इस सूची में आते हैं।

अवशिष्ट शक्तियाँ (Residuary Powers)

संविधान की सातवीं अनुसूची में संघ सूची, राज्य सूची या समवर्ती सूची में स्पष्ट रूप से शामिल न होने वाले विषयों पर कानून बनाने की शक्ति, जो सामान्यतः केंद्र सरकार के पास होती है, लेकिन सरकारी आयोग ने इसे समवर्ती सूची में स्थानांतरित करने की सिफारिश की थी।

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