उच्च शिक्षा में समानता को बढ़ावा देने संबंधी नए UGC विनियम
परिचय
केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने उच्च शिक्षा में समानता को बढ़ावा देने के उद्देश्य से विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) के नए नियमों को लेकर उठ रही चिंताओं पर अपना वक्तव्य दिया। इन नियमों के कारण विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं और "सामान्य वर्ग" के छात्रों के साथ भेदभाव के आरोप लगाए जा रहे हैं।
सर्वोच्च न्यायालय की निगरानी
ये नियम सर्वोच्च न्यायालय की देखरेख में अधिसूचित किए गए थे, जिससे यह सुनिश्चित हो सके कि कोई भेदभाव या दुरुपयोग न हो।
विरोध प्रदर्शन और कानूनी चुनौतियाँ
- लखनऊ, इंदौर और नई दिल्ली जैसे शहरों में विरोध प्रदर्शन हुए।
- इस ढांचे को चुनौती देने वाली कई याचिकाएं सुप्रीम कोर्ट में दायर की गई हैं।
विनियमों की प्रमुख विशेषताएं
- जाति आधारित भेदभाव को अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग को लक्षित करने के रूप में परिभाषित किया गया है।
- अंतिम संस्करण से झूठी शिकायतों पर दंड लगाने के प्रस्तावित प्रावधान को हटा दिया गया है।
आलोचना और समर्थन
- आलोचकों का तर्क है कि ये नियम "सामान्य श्रेणी" के छात्रों को संभावित पीड़ितों के रूप में मान्यता नहीं देते हैं, जिससे भेदभाव के दावे सामने आते हैं।
- अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) इन नियमों को "अच्छी मंशा से बनाया गया" मानती है, लेकिन अधिक स्पष्टता की मांग करती है।
- नेशनल स्टूडेंट्स यूनियन ऑफ इंडिया (NSUI) इन नियमों का समर्थन करता है और इन्हें भेदभाव से निपटने के लिए आवश्यक मानता है।
पृष्ठभूमि और विकास
ये नियम उन याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट की कार्यवाही के बाद सामने आए हैं, जो 2019 में आत्महत्या करने वाले छात्रों के अभिभावकों द्वारा दायर की गई थीं। इन याचिकाओं में 2012 के नियमों की अपर्याप्तता का तर्क दिया गया था। नए ढांचे में "जाति-आधारित भेदभाव" की परिभाषा में अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) को भी शामिल किया गया है और संसदीय सिफारिशों के बाद झूठी शिकायत के लिए दंड का प्रावधान हटा दिया गया है।