नाटो और ग्रीनलैंड को लेकर यूरोप और अमेरिका के बीच दरार
डेनमार्क के अधिकार क्षेत्र में आने वाले क्षेत्र ग्रीनलैंड को लेकर उत्पन्न तनाव के कारण नाटो के एक विश्वसनीय सहयोगी के रूप में अमेरिका पर यूरोप का भरोसा काफी हद तक कम हो गया है। इसके चलते यूरोप की सुरक्षा संरचना और परमाणु प्रतिरोध रणनीति का पुनर्मूल्यांकन करना आवश्यक हो गया है।
नाटो की उत्पत्ति और वर्तमान चुनौतियाँ
- नाटो का गठन: इसकी स्थापना 1949 में सोवियत संघ के खिलाफ एक रक्षात्मक परमाणु गठबंधन के रूप में की गई थी, जिसमें अमेरिका प्राथमिक सुरक्षा गारंटर था।
- विश्वास संबंधी मुद्दे: ग्रीनलैंड को हासिल करने के मामले में ट्रंप के आक्रामक रुख ने नाटो के भीतर दरार पैदा कर दी है, जिससे विश्वास और गठबंधन की परमाणु प्रतिरोधक क्षमता कमजोर हो गई है।
परमाणु निवारण का भविष्य
- सुरक्षा संरचना: अमेरिका के साथ मतभेद के प्रति यूरोप की प्रतिक्रिया भविष्य की रणनीतियों को प्रभावित करेगी, जिससे परमाणु निवारण की अवधारणाओं को संभावित रूप से नया आकार मिलेगा।
- एनपीटी का प्रभाव: आतंकवाद और जलवायु परिवर्तन जैसी चुनौतियों के बावजूद, परमाणु हथियार शांति और सुरक्षा पर होने वाली चर्चाओं का केंद्र बने हुए हैं।
आधुनिकीकरण और भंडार
- चीन का विस्तार: 2023 से प्रतिवर्ष 100 युद्धक हथियार जोड़े गए हैं, जिससे कुल संख्या 600 हो गई है।
- ब्रिटेन का पलटाव: 2006 के एक फैसले को पलटते हुए, 225 युद्धक हथियारों को बरकरार रखा।
- अमेरिका-रूस के बीच संबंध: न्यू स्टार्ट संधि की समाप्ति के साथ, परमाणु हथियारों के भंडार में वृद्धि शीत युद्ध-युग की निवारक नीतियों की ओर वापसी कर सकती है।
यूक्रेन से सीखे गए सबक
- परमाणु खतरे: रूसी धमकियों के बावजूद, यूक्रेन का लचीलापन दर्शाता है कि गैर-परमाणु प्रतिक्रियाएं परमाणु-सशस्त्र विरोधियों को रोक सकती हैं।
- इच्छुक देशों का गठबंधन: यूरोपीय देशों ने यूक्रेन का समर्थन करने के लिए इस समूह का गठन किया है, जो सुरक्षा गठबंधनों में बदलाव का संकेत देता है।
निष्कर्ष
यूरोप में बदलती सुरक्षा परिस्थितियाँ और अमेरिका, रूस और चीन जैसे परमाणु संपन्न देशों की कार्रवाइयाँ भविष्य की परमाणु नीति और प्रतिरोध रणनीतियों पर महत्वपूर्ण प्रभाव डालेंगी। अभी लिए गए निर्णय आने वाले वर्षों के लिए वैश्विक परमाणु परिदृश्य को आकार देंगे।