औद्योगिक संबंध संहिता (संशोधन) विधेयक, 2026
औद्योगिक संबंध संहिता (संशोधन) विधेयक, 2026 संसद के दोनों सदनों द्वारा ध्वनि मत से पारित किया गया। सरकार ने इस बात पर जोर दिया कि इस संशोधन का उद्देश्य औद्योगिक संबंध संहिता, 2020 से संबंधित किसी भी कानूनी अस्पष्टता को दूर करना है।
संशोधन के प्रमुख उद्देश्य
- विरासत कानूनों का निरसन:
- यह विधेयक तीन पुराने श्रम कानूनों को निरस्त करने के लिए वैधानिक समर्थन प्रदान करता है:
- ट्रेड यूनियन अधिनियम, 1926
- औद्योगिक रोजगार (स्थायी आदेश) अधिनियम, 1946
- औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947
- यह विधेयक तीन पुराने श्रम कानूनों को निरस्त करने के लिए वैधानिक समर्थन प्रदान करता है:
- निरसन पर स्पष्टीकरण: इस संशोधन का उद्देश्य उपर्युक्त कानूनों की निरंतरता और निरसन से संबंधित भविष्य में होने वाली किसी भी जटिलता को रोकना है।
सरकार का रुख
- कानूनी स्पष्टता: श्रम और रोजगार मंत्री मनसुख मांडविया ने कहा कि यह संशोधन कानूनी स्पष्टता को मजबूत करता है।
- श्रम संहिताएँ:
- तीन महीने पहले लागू किए गए चार श्रम संहिताएं यह सुनिश्चित करती हैं:
- न्यूनतम मजदूरी
- नियुक्ति पत्र जारी करना
- लिंगभेद के बिना, समान काम के लिए समान वेतन।
- तीन महीने पहले लागू किए गए चार श्रम संहिताएं यह सुनिश्चित करती हैं:
- संरचनात्मक सुधार: ये संहिताएं श्रमिकों के अधिकारों की रक्षा करते हुए श्रम कानूनों को सुव्यवस्थित करने के लिए डिज़ाइन किए गए सुधारों का प्रतिनिधित्व करती हैं।
- सत्ता पक्ष का समर्थन: भाजपा के सहयोगियों सहित सत्ता पक्ष के सांसदों ने इस विधेयक का समर्थन किया और इसे औद्योगिक विकास और श्रम कल्याण के बीच संतुलन स्थापित करने वाला एक "ऐतिहासिक सुधार" बताया।
कानूनी और प्रक्रियात्मक स्पष्टीकरण
- संहिता की धारा 104: इसमें निरंतरता और कानूनी निश्चितता सुनिश्चित करने के लिए बचत प्रावधान शामिल हैं। धारा 104 के द्वारा पूर्ववर्ती कानूनों को निरस्त कर दिया गया है।
- गलतफहमियों का समाधान: संशोधन में यह स्पष्ट किया गया है कि निरसन वैधानिक है और इसे अधिसूचना के माध्यम से कार्यपालिका को प्रत्यायोजित नहीं किया गया है।
विपक्ष की आलोचना
- विपक्षी सदस्यों ने विधेयक की आलोचना करते हुए इसे "श्रमिक विरोधी" बताया और सरकार पर श्रमिकों, किसानों और गरीबों के हितों को कमजोर करने का आरोप लगाया।