उच्चतम न्यायालय ने अपमानजनक ऑनलाइन-कंटेंट को विनियमित करने की आवश्यकता पर जोर दिया | Current Affairs | Vision IAS
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सर्वोच्च न्यायालय ने जवाबदेही और सुरक्षा के लिए डिजिटल प्लेटफार्मों पर हानिकारक, वायरल और गलत सूचना सामग्री को रोकने के लिए नए नियमों, एक स्वतंत्र नियामक, आयु सत्यापन और प्रभावी तंत्र का आग्रह किया है।

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उच्चतम न्यायालय ने ऑनलाइन अपलोड किए जाने वाले ‘उपयोगकर्ता-द्वारा सृजित कंटेंट (User-generated content)’ के लिए प्रभावी विनियमन तंत्र की आवश्यकता पर जोर दिया ताकि  ऑनलाइन कंटेंट के लिए जवाबदेही सुनिश्चित की जा सके।

उच्चतम न्यायालय द्वारा उठाई गई मुख्य चिंताएँ

  • ऑनलाइन कंटेंट का तेजी से वायरल होना और अधिक लोगों तक पहुंचना: नुकसानदेह सोशल मीडिया पोस्ट कुछ ही सेकंड में वायरल हो सकते हैं। इसके खिलाफ जब तक जवाबी कार्रवाई वाले "टेकडाउन" तंत्र सक्रिय होते हैं तब तक लोगों या संस्था की प्रतिष्ठा या सुरक्षा को नुकसान पहुंच चुका होता है।
  • वयस्क लोगों के लिए कंटेंट: “केवल वयस्कों के लिए” जैसी एक-पंक्ति की चेतावनियां नाबालिगों को अश्लील कंटेंट तक पहुँचने से रोकने में असमर्थ रही हैं।
  • उपयोगकर्ता-सृजित चैनलों पर नियंत्रण नहीं होना: कोई भी व्यक्ति किसी विनियामक संस्था की निगरानी के बिना ऑनलाइन चैनल संचालित कर सकता है। इससे बिना-सत्यापन वाले या उकसाने वाले कंटेंट बिना रोक-टोक के प्रसारित होते रहते हैं।
  • दुष्प्रचार: असहमति लोकतंत्र का आधार है, लेकिन डिजिटल प्लेटफॉर्म्स तब समस्या बन जाते हैं जब भ्रामक जानकारी या दुष्प्रचार का उपयोग घृणा भड़काने, तथ्यों को तोड़मरोड़ करके प्रस्तुत करने या सामाजिक अशांति उत्पन्न करने के लिए किया जाता है।

उच्चतम न्यायालय के प्रस्ताव और दिशा-निर्देश

  • नए दिशानिर्देशों का मसौदा तैयार करना: न्यायालय ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया कि वह लोगों से परामर्श के बाद सभी डिजिटल कंटेंट्स के लिए नए नियम बनाए। इनमें उपयोगकर्ता-द्वारा सृजित कंटेंट, OTT, समाचार और क्यूरेटेड कंटेंट शामिल हैं। 
  • स्वायत्तशासी विनियामक: शीर्ष न्यायालय ने एक निष्पक्ष और स्वतंत्र प्राधिकरण स्थापित करने का सुझाव दिया। यह प्राधिकरण ऑनलाइन कंटेंट को विनियमित करेगा और मौजूदा स्व-विनियमन मॉडल्स की जगह लेगा या उसके पूरक की भूमिका निभाएगा।
  • विशेषज्ञ समिति का गठन: न्यायालय ने एक विशेषज्ञ समिति गठित करने का निर्देश दिया। इस समिति में विषय-क्षेत्र के विशेषज्ञों और न्यायिक पृष्ठभूमि वाले व्यक्तियों को शामिल किया जाना चाहिए।
  • आयु सत्यापन प्रणाली: वयस्क या अश्लील कंटेंट तक पहुँच से पहले उपयोगकर्ता की आयु आधार नंबर या पैन नंबर से सत्यापित की जानी चाहिए। इससे केवल अंकित चेतावनियों पर निर्भरता नहीं रहेगी।

ऑनलाइन कंटेंट विनियमन हेतु वर्तमान कानूनी तंत्र

  • सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 (IT Act) और सूचना-प्रौद्योगिकी (IT) नियमावली 2021: ये कानून शिकायत निवारण अधिकारी की नियुक्ति, गैरकानूनी कंटेंट को समयबद्ध तरीके से हटाने और मध्यवर्तियों (सोशल मीडिया संस्था) द्वारा उचित सावधानी बरतना अनिवार्य करते हैं।
    • अक्टूबर 2025 में, केंद्र सरकार ने यह सुनिश्चित करने के लिए नियम प्रस्तावित किए कि AI से सृजित कंटेंट अपलोड करने से पहले स्पष्ट रूप से लेबल लगा होना चाहिए और मध्यवर्तियों द्वारा सत्यापित हो।
  • भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023: यह संहिता मानहानि, अश्लीलता, देशद्रोह जैसे कृत्यों और हिंसा के लिए उकसाने को अपराध घोषित करती है।
  • डिजिटल प्लेटफॉर्म की स्व-विनियमन संहिता: OTT सेवा-प्रदाताओं और प्रसारकों ने आंतरिक स्तर पर दिशानिर्देश, रेटिंग प्रणाली और कंटेंट संशोधन प्रक्रियाएं सुनिश्चित की हैं।
  • न्यायपालिका से राहत: पीड़ित व्यक्ति हानि होने के बाद क्षतिपूर्ति की मांग, पोस्ट रोकने के लिए निषेधाज्ञा (injunctions) का आदेश जारी करने, या आपराधिक कार्रवाई चलाने की मांग न्यायपालिका से कर सकता है।
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