वर्ल्ड इनइक्वलिटी लैब ने भारत में भूमि असमानता पर रिपोर्ट जारी की | Current Affairs | Vision IAS

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In Summary

  • भारत में भूमि असमानता पर एक रिपोर्ट से पता चलता है कि धन का अत्यधिक केंद्रीकरण है, जिसमें शीर्ष 10% ग्रामीण परिवारों के पास 44% भूमि है और 46% परिवार भूमिहीन हैं।
  • भूमि असमानता के प्रमुख कारकों में ऐतिहासिक औपनिवेशिक कार्यकाल प्रणाली, अनुसूचित जाति की आबादी को प्रभावित करने वाला सामाजिक स्तरीकरण और छोटे किसानों को जमीन बेचने के लिए प्रोत्साहित करने वाला आर्थिक एकीकरण शामिल हैं।
  • भूमि असमानता को कम करने के लिए ऐतिहासिक और वर्तमान उपायों में स्वतंत्रता के बाद के भूमि सुधार, भूदान और ग्रामदान आंदोलन, वन अधिकार अधिनियम और भूमि अभिलेख आधुनिकीकरण कार्यक्रम शामिल हैं।

In Summary

"भारत में भूमि असमानता: प्रकृति, इतिहास और बाजार" शीर्षक से जारी इस रिपोर्ट में भारत के दस प्रमुख राज्यों का डेटा शामिल है। इन दस राज्यों में भारत की 75% ग्रामीण आबादी बसती है।

रिपोर्ट के मुख्य बिंदुओं पर एक नजर

  • अत्यधिक संपत्ति संकेंद्रण: शीर्ष 10% ग्रामीण परिवारों के पास कुल भूमि-क्षेत्र का 44% हिस्सा है।
  • व्यापक भूमिहीनता: भारत के लगभग 46% ग्रामीण परिवार पूरी तरह से भूमिहीन हैं।
  • ग्राम-स्तरीय भूमि गिनी गुणांक: यह 71.1 के अत्यधिक उच्च स्तर पर है।
  • बड़े भूस्वामी: एक औसत गांव में सबसे बड़े भूस्वामी के नियंत्रण में गांव की लगभग 12.4% भूमि है।
  • क्षेत्रीय आधार पर असमानताएं:
    • सर्वाधिक असमानता: केरल में (भूमि गिनी गुणांक 90)।
    • न्यूनतम असमानता: कर्नाटक और राजस्थान में (भूमि गिनी गुणांक 65 से नीचे)।
    • भूमिहीनता की दर: पंजाब में सर्वाधिक (73%)।

भारत में भूमि असमानता के मुख्य कारक

  • उच्च उत्पादकता: उच्च उत्पादकता बड़े भू-जोतों के विस्तार में मदद करती है और भूमिहीनता को बढ़ावा देती है।
  • इतिहास:
    • औपनिवेशिक काल: पूर्व में ब्रिटिश ज़मींदारी व्यवस्था के अधीन रहे क्षेत्रों में "रियासतों" (देशी राज्यों) की तुलना में अधिक असमानता देखी जाती है।
    • सामाजिक स्तरीकरण: जिन गांवों में अनुसूचित जाति (SC) की आबादी अधिक है, वहाँ ऐतिहासिक भूमिहीनता के कारण अधिक असमानता देखी जाती है।
  • बाजार (आर्थिक एकीकरण): कस्बों, प्रमुख राजमार्गों, रेलवे, बैंकों और कृषि मंडियों जैसे आर्थिक केंद्रों से निकटता उच्च भूमि असमानता से जुड़ी है।
    • आर्थिक एकीकरण खेती की तुलना में गैर-कृषि कार्यों से आय में बदलाव लाता है। इससे लघु कृषकों को लगता है कि उनकी लघु आकार और कम लाभ वाली जमीन बेकार है, इसलिए वे उसे बड़े भू स्वामियों को बेचने के लिए प्रेरित हो जाते हैं।

भारत में भूमि असमानता को कम करने के लिए उठाए गए कदम

  • स्वतंत्रता के बाद भूमि सुधार: इनमें शामिल हैं; मध्यस्थों (ज़मींदारी व्यवस्था) का उन्मूलन, भूमि हदबंदी अधिनियमों का लागू होना, काश्तकार सुधार (वास्तविक खेती करने वालों को भू-स्वामित्व का अधिकार देना), आदि।
  • भूदान और ग्रामदान आंदोलन: 1951 में विनोबा भावे के नेतृत्व में शुरू हुआ। इन आंदोलनों के तहत भूस्वामियों से भूमि के स्वैच्छिक दान की अपील की गई थी।
  • डिजिटल इंडिया भूमि-अभिलेख आधुनिकीकरण कार्यक्रम (DILRMP): इसका उद्देश्य भूमि अभिलेखों (रिकार्ड्स) का आधुनिकीकरण है; जैसे कर्नाटक की 'भूमि परियोजना'
  • वन अधिकार अधिनियम (FRA), 2006: इसके तहत वनवासी समुदायों और जनजातीय आबादी के भूमि अधिकारों को मान्यता दी गई।
  • भूमि अर्जन, पुनर्वासन और पुनर्व्यवस्थापन में उचित प्रतिकर और पारदर्शिता का अधिकार अधिनियम, 2013: इसके तहत भूमि अधिग्रहण के लिए निष्पक्ष प्रणालियां  स्थापित की गईं।
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भूमि अर्जन, पुनर्वासन और पुनर्व्यवस्थापन में उचित प्रतिकर और पारदर्शिता का अधिकार अधिनियम, 2013 (Right to Fair Compensation and Transparency in Land Acquisition, Rehabilitation and Resettlement Act, 2013)

यह कानून भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी, न्यायसंगत और संवेदनशील बनाने के लिए स्थापित किया गया था, जिसमें प्रभावित लोगों के लिए उचित मुआवजा, पुनर्वास और पुनर्व्यवस्थापन सुनिश्चित किया गया है।

वन अधिकार अधिनियम (Forest Rights Act - FRA), 2006

यह अधिनियम भारत के वन क्षेत्रों में रहने वाले पारंपरिक वनवासी समुदायों और जनजातीय आबादी के भूमि अधिकारों और उनके द्वारा उपयोग किए जाने वाले वन संसाधनों को मान्यता देता है।

डिजिटल इंडिया भूमि-अभिलेख आधुनिकीकरण कार्यक्रम (Digital India Land Records Modernization Programme - DILRMP)

यह भारत सरकार की एक पहल है जिसका उद्देश्य भूमि अभिलेखों (जैसे स्वामित्व, पट्टे, उत्परिवर्तन) को डिजिटाइज़ करना, अद्यतन करना और व्यवस्थित करना है ताकि पारदर्शिता, दक्षता और भूमि विवादों को कम किया जा सके।

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