केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने सभी राज्य और केंद्रीय प्राधिकरणों को निर्देश दिया है कि वे 31 दिसंबर, 2027 के बाद नए या अतिरिक्त HFC उत्पादन के लिए पर्यावरणीय मंजूरी देना बंद कर दें।
- यह निर्देश किगाली संशोधन के तहत भारत की प्रतिबद्धताओं के अनुरूप है।
किगाली संशोधन (2016) के बारे में
- इसके तहत, मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल के पक्षकार देश HFCs के उत्पादन और खपत को चरणबद्ध रूप से कम करने पर सहमत हुए थे।
- ध्यातव्य है कि HFCs को ओजोन-क्षयकारी पदार्थों (ODS) के ऐसे विकल्प के रूप में पेश किया गया था जो ओजोन को नुकसान नहीं पहुंचाते हैं।
- हालांकि HFCs ओजोन परत को नुकसान नहीं पहुँचाते, लेकिन इनकी वैश्विक तापवृद्धि क्षमता (GWP) बहुत अधिक (CO₂ की तुलना में 12 से 14,000 गुणा) है।
- ध्यातव्य है कि HFCs को ओजोन-क्षयकारी पदार्थों (ODS) के ऐसे विकल्प के रूप में पेश किया गया था जो ओजोन को नुकसान नहीं पहुंचाते हैं।
- प्रमुख लक्ष्य:
- पक्षकार देश 2040 के दशक के अंत तक HFCs के उपयोग को 80-85% तक कम करने पर सहमत हुए।
- भारत वर्ष 2032 के बाद से 4 चरणों में HFCs के उपयोग में चरणबद्ध रूप से कमी करेगा: 2032 में 10%, 2037 में 20%, 2042 में 30% और 2047 में 85% की संचयी कमी।
मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल (1987) के बारे में
- यह ओजोन परत के संरक्षण के लिए ओजोन-क्षयकारी पदार्थों (ODS) को चरणबद्ध तरीके से समाप्त करने हेतु एक अंतरराष्ट्रीय संधि है।
- इसे वियना अभिसमय के तहत लागू किया गया। वियना अभिसमय को 1985 में अपनाया गया था।
- शामिल पदार्थ: यह प्रोटोकॉल क्लोरोफ्लोरोकार्बन (CFCs), हाइड्रोक्लोरोफ्लोरोकार्बन (HCFCs) और हैलोन जैसे ओजोन-क्षयकारी पदार्थों (ODS) को लक्षित करता है।
- 1992 तक, इसे सार्वभौमिक रूप से अनुमोदित कर दिया गया था, अर्थात संयुक्त राष्ट्र के सभी सदस्य देश इस पर हस्ताक्षर कर चुके थे। इसमें 'समान लेकिन विभेदित उत्तरदायित्वों' (Common but Differentiated Responsibilities) के सिद्धांत को लागू किया गया।
ओजोन और ओजोन-क्षयकारी पदार्थों (ODS) के बारे में
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