हाल ही में रूसी राष्ट्रपति की चीन यात्रा ने रूस की चीन पर बढ़ती निर्भरता को रेखांकित किया। दोनों पक्षों ने 40 से अधिक समझौतों पर हस्ताक्षर किए और पश्चिमी देशों के प्रभुत्व के खिलाफ एक 'बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था' के लिए अपने समर्थन को दोहराया।

रूस-चीन के प्रगाढ़ होते संबंधों के कारण
- साझा भू-राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता: दोनों देश संयुक्त राज्य अमेरिका के नेतृत्व वाली व्यवस्था को अपने मूल हितों के लिए खतरा मानते हैं।
- आर्थिक पूरक की भूमिका निभाना: पश्चिमी देशों के प्रतिबंधों ने रूस की चीन पर निर्भरता बढ़ा दी है।
- डी-डॉलराइजेशन और वैकल्पिक संस्थाएं: चीन की युआन मुद्रा और रूस की रूबल मुद्रा में व्यापार लगातार बढ़ रहा है। साथ ही, ब्रिक्स और शंघाई सहयोग संगठन (SCO) जैसे मंचों का उपयोग गैर-पश्चिमी यूरेशियाई सुरक्षा व्यवस्था को बढ़ावा देने के लिए किया जा रहा है।
भारत पर प्रभाव
- रणनीतिक संतुलनकर्ता के रूप में रूस की भूमिका में कमी: रूस की चीन पर बढ़ती निर्भरता भारत-चीन तनावों में उसकी तटस्थता को कमजोर कर रही है।
- रक्षा संबंधी कमजोरियां: भारत की रूसी हथियारों (जैसे कि S-400 व स्टेल्थ फ्रिगेट्स) पर निर्भरता आपूर्ति में देरी के संकट का सामना कर रही है। साथ ही, रूस द्वारा चीन को अत्याधुनिक सैन्य प्लेटफॉर्मों की बिक्री से भारत की सुरक्षा चिंताएं बढ़ी हैं।
- रूस–चीन–पाकिस्तान के उभरते संबंध: उदाहरण के लिए, रूस हथियारों की बिक्री और रियायती तेल निर्यात के माध्यम से पाकिस्तान के साथ अपने संबंध सुदृढ़ कर रहा है।
- बहुपक्षीय मंचों पर चुनौतियां: उदाहरण के लिए, शंघाई सहयोग संगठन (SCO) में रूस और चीन के बीच सहयोग बढ़ रहा है।
- भारत की रणनीतिक स्वायत्तता पर दबाव: रूस-चीन की बढ़ती नजदीकी और संयुक्त राज्य अमेरिका की अनिश्चित नीतियाँ भारत की बहु-पक्षीय मंचों के साथ जुड़ने की रणनीति को सीमित कर रही हैं।