हाल ही में हुए बीजिंग शिखर सम्मेलन के दौरान, अमेरिका और चीन ने 'रणनीतिक स्थिरता' (Strategic Stability) के आधार पर द्विपक्षीय संबंधों को आगे बढ़ाने पर सहमति व्यक्त की।
- अमेरिका के अनुसार ‘रणनीतिक स्थिरता’ का विचार निष्पक्षता और पारस्परिकता पर आधारित है, जबकि चीन के लिए इसमें प्रतिस्पर्धा को उचित सीमाओं में बनाए रखना और चीन के मूल हितों का सम्मान करना भी शामिल है।
शिखर सम्मेलन के अन्य मुख्य बिंदु:
- अमेरिका-चीन व्यापार और निवेश बोर्ड की स्थापना: द्विपक्षीय व्यापार और निवेश के प्रबंधन के लिए।
- ताइवान का मुद्दा: जहां चीन ने ताइवान को अमेरिका-चीन संबंधों में सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा बताया, वहीं अमेरिका ने अपनी फैक्ट शीट में इसका कोई उल्लेख नहीं किया।
- वैश्विक सुरक्षा: दोनों पक्ष होर्मुज जलसंधि को खोलने पर सहमत हुए।
- सौदेबाजी का ढांचा, स्पष्ट समाधान नहीं: जहां संयुक्त राज्य अमेरिका के लिए इस शिखर सम्मेलन से विमान बिक्री, कृषि खरीद और बाजार पहुंच की पुनर्बहाली जैसे महत्वपूर्ण परिणाम सामने आए, वहीं चीन के अनुसार इन परिणामों को अभी अंतिम रूप दिया जाना बाकी है।
अमेरिका-चीन संबंधों में मुख्य अड़चनें:
- जीरो-सम गेम की धारणा: आम तौर पर यह माना जाता है कि चीन का लाभ अमेरिका की हानि है।
- चीन की ‘वन बेल्ट वन रोड’ पहल, एशियाई अवसंरचना निवेश बैंक (AIIB) की स्थापना आदि को अमेरिकी प्रभुत्व के खिलाफ कदम के रूप में देखा जाता है।
- वैचारिक मतभेद: चीन की अधिनायकवादी व्यवस्था और साम्यवादी शासन, अमेरिका को रोकने की नीति को और अधिक सुदृढ़ करते हैं।
- रूस-चीन धुरी: यूक्रेन पर आक्रमण के बाद रूस की चीन के साथ बढ़ती नजदीकी और एशिया की ओर उसकी ‘पूर्वमुखी रणनीतिक नीति’ (Strategic pivot eastward) भी तनाव का कारण बनती है।
- हाल ही में, अमेरिका-चीन शिखर सम्मेलन के तुरंत बाद चीन-रूस बैठक आयोजित हुई। इसमें दोनों देशों ने अमेरिकी 'गोल्डन डोम' मिसाइल रक्षा प्रणाली को लेकर कड़ी चेतावनी जारी की।
निष्कर्ष: अपेक्षाकृत स्थिर अमेरिका-चीन संबंध वैश्विक आर्थिक संवृद्धि के समक्ष जोखिमों को कम करते हैं, लेकिन प्रतिस्पर्धा के संतुलित और लेन-देन आधारित सह-अस्तित्व की नई परिस्थितियाँ भारत से अपनी नीतियों में संतुलित दृष्टिकोण अपनाने की अपेक्षा रखती हैं।