गर्भावस्था के चिकित्सीय समापन पर सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय
भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने 17 वर्षीय युवती के 30 सप्ताह के गर्भ को चिकित्सकीय रूप से समाप्त करने का निर्देश दिया है। इस मामले ने प्रजनन अधिकारों, विशेष रूप से नाबालिगों से संबंधित अधिकारों को लेकर महत्वपूर्ण कानूनी और नैतिक प्रश्न खड़े किए हैं।
मामले का विवरण
- यह गर्भावस्था पड़ोस के एक लड़के के साथ संबंध का परिणाम थी।
- नाबालिग होने के कारण लड़की ने गर्भपात कराने की मांग की।
- न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना और उज्ज्वल भुयान की अध्यक्षता वाली अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि अदालतें किसी महिला, विशेषकर नाबालिग महिला को गर्भावस्था जारी रखने के लिए मजबूर नहीं कर सकतीं।
चिकित्सा एवं कानूनी विचार
- अदालत ने इस बात पर गौर किया कि यदि गर्भावस्था पूरी अवधि तक चलती है तो मां या बच्चे के जीवन को कोई खतरा नहीं है।
- इस बात पर जोर दिया गया कि लड़की को प्रजनन संबंधी स्वायत्तता प्राप्त है और वह गर्भावस्था को जारी रखने के लिए स्पष्ट रूप से अनिच्छुक है।
- प्रक्रियात्मक समयसीमा के संबंध में 1971 के चिकित्सा गर्भपात (MTP) अधिनियम का संदर्भ दिया गया था।
नैतिक निहितार्थ
- न्यायमूर्ति नागरत्ना ने ऐसे मामलों में नैतिकता और वैधता से संबंधित चुनौतियों पर प्रकाश डाला।
- अदालत के हस्तक्षेप न करने की स्थिति में अवैध गर्भपात के संभावित खतरों के बारे में चिंताएं जताई गईं।
टिप्पणियाँ और भविष्य के निहितार्थ
- अदालत ने गर्भवती नाबालिग के हितों और स्वायत्तता पर विचार करने की आवश्यकता पर जोर दिया।
- यह बात सामने आई कि यदि गर्भावस्था को 24 सप्ताह में समाप्त किया जा सकता है, तो 30 सप्ताह में भी इसी तरह के विचार लागू होने चाहिए यदि मां गर्भावस्था को जारी रखने के लिए इच्छुक नहीं है।
- अदालत तत्काल निर्देश जारी करने के बाद विस्तृत आदेश जारी करने की योजना बना रही है।