भारत में महिलाओं के लिए प्रजनन स्वायत्तता | Current Affairs | Vision IAS

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In Summary

  • सुप्रीम कोर्ट ने नाबालिग की 30 सप्ताह की गर्भावस्था को समाप्त करने की अनुमति दी है, जो एमटीपी अधिनियम, 2021 के तहत निर्धारित 24 सप्ताह की सीमा से अधिक है।
  • प्रजनन स्वायत्तता, जिसे एक महिला के अपने शरीर और मातृत्व के बारे में निर्णय लेने के अधिकार के रूप में परिभाषित किया जाता है, को निर्णय लेने की शक्ति की कमी और पितृसत्तात्मक नियंत्रण जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है।
  • प्रजनन संबंधी स्वायत्तता को प्रभावित करने वाले मुद्दों में किशोरों के लिए अपर्याप्त यौन स्वास्थ्य शिक्षा, माता-पिता की सहमति की आवश्यकता और ग्रामीण क्षेत्रों में सीमित स्वास्थ्य सेवा अवसंरचना शामिल हैं।

In Summary

प्रजनन स्वायत्तता के महत्वपूर्ण समर्थन में, उच्चतम न्यायालय ने एक नाबालिग की 30 सप्ताह की गर्भावस्था को समाप्त करने की अनुमति दी। यह निर्णय गर्भ का चिकित्सकीय समापन (MTP) अधिनियम, 1971 के तहत निर्धारित 24 सप्ताह की वैधानिक सीमा से आगे जाकर दिया गया है।

  • इस अधिनियम में 2021 में संशोधन किया गया था।  MTP (संशोधन) अधिनियम, 2021 के अनुसार:
    • 20 सप्ताह तक के गर्भ के मामले में: एक चिकित्सक की सलाह पर सभी महिलाओं को गर्भावस्था को समाप्त करने की अनुमति है। 
    • 20-24 सप्ताह तक के गर्भ के मामले में: कम-से-कम दो चिकित्सकों की सलाह अनिवार्य है।
    • 24 सप्ताह से अधिक के गर्भ के मामले में: केवल भ्रूण की असामान्य स्थिति में मेडिकल बोर्ड की सलाह पर गर्भ की समाप्ति की अनुमति है।
  • इससे पहले, जस्टिस के.एस. पुट्टास्वामी बनाम भारत संघ (2017) मामले में, उच्चतम न्यायालय ने महिलाओं के प्रजनन विकल्पों को अनुच्छेद 21 के तहत 'दैहिक स्वतंत्रता का अधिकार' के दायरे में रखा था।

प्रजनन स्वायत्तता के बारे में

  • परिभाषा: प्रजनन स्वायत्तता को एक महिला के अपने शरीर, प्रजनन क्षमता और मातृत्व के संबंध में स्वयं निर्णय लेने के अधिकार के रूप में मान्यता दी गई है।
  • प्रजनन स्वायत्तता के मार्ग में चुनौतियां और मुद्दे
    • निर्णय लेने की शक्ति का अभाव: NFHS-5 के अनुसार, भारत में केवल 10% महिलाएं ही अपने स्वास्थ्य के बारे में स्वतंत्र रूप से निर्णय ले पाती हैं। उदाहरण के लिए- अस्पतालों में गर्भपात हेतु पति की सहमति मांगना एक आम प्रथा है।
    • पितृसत्तात्मक नियंत्रण और महिलाओं का वस्तुकरण: महिलाओं को स्वायत्त व्यक्तियों की बजाय केवल 'प्रजनन के साधन' के रूप में देखा जाता है।
    • किशोरी यौन स्वास्थ्य: स्कूलों में यौन शिक्षा को अक्सर सामाजिक रूप से वर्जित माना जाता है या प्रतिबंधित कर दिया जाता है। इससे किशोर/किशोरियों को सुरक्षित यौन प्रथाओं का बहुत कम ज्ञान होता है। साथ ही, किशोरों/किशोरियों को अपने प्रजनन अधिकारों का प्रयोग करने के लिए माता-पिता की सहमति की आवश्यकता होती है।
    • अपर्याप्त स्वास्थ्य देखभाल अवसंरचना: ग्रामीण क्षेत्रों में विशेषज्ञों की भारी कमी और गर्भनिरोधक साधनों तक सीमित पहुंच एक बड़ी बाधा है।
    • महिलाओं की प्रजनन स्वायत्तता न केवल उनके लिए मौलिक रूप से मूल्यवान है, बल्कि पूरी मानवता के कल्याण के लिए भी अत्यंत महत्वपूर्ण है।
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NFHS-5

The fifth National Family Health Survey, a large-scale, multi-round survey conducted in a representative sample of households across India. It provides critical data on population, health, and nutrition for policymakers and researchers.

प्रजनन स्वायत्तता

यह एक महिला का अपने शरीर, प्रजनन क्षमता और मातृत्व के संबंध में स्वतंत्र रूप से निर्णय लेने का अधिकार है। इसमें गर्भधारण करने या न करने, बच्चों की संख्या और उनके जन्म के समय का निर्णय लेने की स्वतंत्रता शामिल है।

अनुच्छेद 21

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 21 जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की सुरक्षा का अधिकार प्रदान करता है। सर्वोच्च न्यायालय ने इसे गरिमा के साथ जीवन जीने के अधिकार के विस्तार के रूप में व्याख्यायित किया है, जिसमें मासिक धर्म स्वास्थ्य और स्वच्छता प्रबंधन तक पहुंच भी शामिल है।

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