एक साथ चुनाव और संवैधानिक निहितार्थ
भारत में एक साथ चुनाव कराने को लेकर चर्चा संसद की संयुक्त समिति तक पहुंच गई है, जहां भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश बी.आर. गवई ने अपने विचार रखे।
संवैधानिक वैधता
- मूल संरचना: न्यायमूर्ति बी.आर. गवई ने कहा कि एक साथ चुनाव कराना संविधान की मूल संरचना या उसके संघीय ढांचे का उल्लंघन नहीं करता है।
- प्रस्तावित संशोधन को चुनाव कराने के तरीके में बदलाव माना जा रहा है, लेकिन इससे चुनाव की संरचना या मतदाताओं के अधिकारों में कोई परिवर्तन नहीं होगा।
- संसदीय सक्षमता: न्यायमूर्ति गवई ने इस बात की पुष्टि की कि ऐसे कानून बनाना संसद की सक्षमता के अंतर्गत आता है, बशर्ते कि "अविश्वास प्रस्ताव" जैसे मौजूदा तंत्र अप्रभावित रहें।
पूर्व मुख्य न्यायाधीशों के विचार
- समर्थन में विचार: न्यायमूर्ति रंजन गोगोई, डी वाई चंद्रचूड़, जे.एस. खेहर और बी.आर. गवई सहित चार पूर्व मुख्य न्यायाधीशों ने विधेयक का समर्थन करते हुए कहा कि यह संविधान के मूल ढांचे का उल्लंघन नहीं करता है।
- उठाई गई चिंताएँ: न्यायमूर्ति यू.यू. ललित और संजीव खन्ना ने विशेष रूप से केशवानंद भारती के फैसले के संबंध में चिंता व्यक्त की, जो संविधान की मूल संरचना की रक्षा करता है।
- चुनाव आयोग की शक्तियां: सभी पूर्व मुख्य न्यायाधीशों ने चुनाव कार्यक्रम के संबंध में चुनाव आयोग को दी गई व्यापक शक्तियों पर पहले भी सवाल उठाए हैं।
संसदीय समीक्षा
- संसदीय संयुक्त समिति लोकसभा में पेश किए गए संविधान (129वां संशोधन) विधेयक, 2024 का विश्लेषण कर रही है।
- इस विधेयक का उद्देश्य चुनाव आयोग को लोक सभा और राज्य विधान सभाओं के लिए एक साथ चुनाव कराने का अधिकार देना है, जिससे कार्यकुशलता और लागत-प्रभावशीलता में सुधार होगा।
- साझा मतदाता सूची: सदस्यों ने विभिन्न चुनाव स्तरों पर प्रक्रियाओं को सुव्यवस्थित करने और सरकारी शिक्षकों पर कार्यभार कम करने के लिए एक साझा मतदाता सूची का प्रस्ताव रखा।
संसदीय संयुक्त समिति ने संसाधनों की बचत के लिए विधेयक को शीघ्र लागू करने में राष्ट्रीय हित पर बल दिया। विचार-विमर्श जारी है, जो विधेयक के निहितार्थों के निरंतर मूल्यांकन को दर्शाता है।