भारतीय उद्योग परिसंघ (CII) ने अधिकरणों के लिए एक ‘केंद्रीकृत निरीक्षण तंत्र’ स्थापित करने की सिफारिश की | Current Affairs | Vision IAS
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CII ने अधिकरण सुधार अधिनियम, 2021 में संशोधन कर एक वैधानिक केंद्रीय निगरानी निकाय स्थापित करने की सिफारिश की है। इस निकाय का कार्य अधिकरणों के उद्देश्य, संरचना, दायरे और जिम्मेदारियों को स्पष्ट रूप से परिभाषित करना होना चाहिए। 

  • इस केंद्रीय निकाय की निम्नलिखित संभावित भूमिकाएं होगी:
    • प्रदर्शन की निगरानी करना;
    • खोज-सह-चयन समितियों से समन्वय करना;
    • अधिकरणों की क्षमता में वृद्धि करना आदि।

अधिकरणों के लिए केंद्रीकृत निरीक्षण तंत्र की आवश्यकता क्यों है?

  • विखंडित प्रशासनिक नियंत्रण: लगभग 16 केंद्रीय अधिकरण विविध मंत्रालयों के अधीन कार्य करते हैं। इससे मानकीकरण की कमी और कार्यप्रणाली में असंगतियां पैदा होती हैं।
  • न्यायिक स्वतंत्रता: अधिकरणों में नियुक्तियों और सेवा शर्तों पर कार्यपालिका का नियंत्रण शक्ति के पृथक्करण सिद्धांत को कमजोर करता है। केंद्रीय निकाय नियुक्तियों को पारदर्शी और योग्यता आधारित बनाकर अधिकरणों को कार्यपालिका के प्रभाव से बचा सकता है।
  • एकरूपता: वर्तमान में, अधिकरणों की सदस्यता की संरचना, चयन प्रक्रिया या योग्यता में कोई एकरूपता नहीं है।
  • अधिकरणों की कार्यकुशलता में सुधार: लंबित विवादों में फंसे बड़े राजकोषीय संसाधनों को मुक्त करने और व्यवसाय करने की सुगमता बढ़ाने के लिए यह आवश्यक है।
    • उदाहरण के लिए- 31 दिसंबर 2024 तक केवल आयकर अपीलीय अधिकरण में ही ₹6.7 ट्रिलियन मूल्य के मामले लंबित थे, जो देश में सभी प्रत्यक्ष कर संबंधी विवादों का लगभग 57% था।
  • न्यायिक निर्देश: सुप्रीम कोर्ट ने एल. चंद्र कुमार (1997) और मद्रास बार एसोसिएशन (2020) मामलों में एक केंद्रीय निगरानी निकाय की आवश्यकता पर बल दिया था।

अधिकरणों के बारे में

  • अधिकरण कानून द्वारा स्थापित न्यायिक अथवा अर्ध-न्यायिक संस्थाएं हैं।
  • संवैधानिक प्रावधान: 1976 में 42वें संविधान संशोधन द्वारा अनुच्छेद 323A और 323B जोड़े गए थे:
    • अनुच्छेद 323A: इसके तहत संसद को लोक सेवा से संबंधित मामलों के न्यायनिर्णयन के लिए केंद्र और राज्य दोनों स्तरों पर प्रशासनिक अधिकरण गठित करने का अधिकार दिया गया है।
    • अनुच्छेद 323B: यह कुछ विशेष विषयों जैसे कि कराधान, भूमि सुधार आदि के लिए संसद या राज्य विधान-मंडलों को अधिकरण स्थापित करने की अनुमति देता है।
  • महत्त्व: अधिकरण पारंपरिक न्यायालयों की तुलना में तीव्र न्यायनिर्णयन के लिए मंच प्रदान करते हैं। साथ ही, कुछ विषयों पर विशेषज्ञता के आधार पर निर्णय लेते हैं, जिससे मामलों का निपटारा अधिक प्रभावी होता है।
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