भारतीय वन्यजीव संस्थान (WII) ने पहली बार गिद्धों पर “संकटग्रस्त प्रजातियों का अखिल भारतीय आकलन और निगरानी रिपोर्ट” जारी की | Current Affairs | Vision IAS
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भारतीय साक्षरता सर्वेक्षण में चार संकटग्रस्त गिद्ध प्रजातियों का आकलन किया गया, 17 राज्यों में 216 स्थलों पर उपस्थिति दर्ज, संरक्षण आवश्यक है, मुख्य खतरे और संरक्षण उपाय पर बल।

In Summary

इस देशव्यापी प्रथम सर्वेक्षण में चार अत्यंत संकटग्रस्त (Critically Endangered) गिद्ध प्रजातियों पर ध्यान केंद्रित किया गया है। ये प्रजातियां हैं- श्वेत पुट्ठे वाले गिद्ध, भारतीय गिद्धपतली चोंच वाले गिद्ध और लाल सिर वाले गिद्ध। इस आकलन में प्रजनन करने वाले वयस्क गिद्धों की संख्या का अनुमान लगाया गया है।

रिपोर्ट के मुख्य बिंदुओं पर एक नजर

  • भौगोलिक दायरा: सर्वेक्षण में 17 राज्यों के 216 स्थलों पर गिद्धों की उपस्थिति दर्ज की गई है।
  • रेंज क्षेत्र में कमी: देशभर में ऐसे लगभग 70% स्थलों पर गिद्धों के घोंसले नहीं पाए गए हैं, जहां पहले इनकी उपस्थिति होती थी। 
  • संरक्षित क्षेत्रों (PAs) पर निर्भरता: सभी दर्ज किए गए घोंसलों में से 54% संरक्षित क्षेत्रों में पाए गए हैं।
  • प्रजाति-विशिष्ट निष्कर्ष:
    • भारतीय गिद्ध (Gyps indicus/ जिप्स इंडिकस): यह मुख्य रूप से मध्य प्रदेश और राजस्थान में पाया जाता है। इनकी सबसे बड़ी आबादी मुकुंदरा हिल्स में पाई जाती है। यह ज्यादातर सुरक्षित चट्टानी स्थलों पर रहता है।
    • श्वेत पुट्ठे वाला गिद्ध (Gyps bengalensis/ जिप्स बंगालेंसिस): हिमाचल प्रदेश की कांगड़ा घाटी में पाया जाता है।
    • पतली चोंच वाला गिद्ध (Gyps tenuirostris/ जिप्स टेनुइरोस्ट्रिस): मुख्य रूप से असम के ऊपरी भाग में प्रजनन करता है।
    • लाल सिर वाला गिद्ध (Sarcogyps calvus/ सरकोजिप्स कैल्वस): यह मध्य प्रदेश में पाया गया जाता है। यह सघन व मानव हस्तक्षेप से मुक्त जंगलों में रहता है। इसकी आबादी अत्यंत कम और बिखरी हुई है।

गिद्ध

  • परिचय: गिद्ध बड़े आकार के मांसभक्षी पक्षी हैं। ये भोजन के लिए मुख्य रूप से मृत जीवों पर निर्भर रहते हैं। ये अधिकतर उष्णकटिबंधीय और उपोष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में पाए जाते हैं। भारत में इनकी 9 प्रजातियां मिलती हैं।
  • महत्त्व: गिद्ध पर्यावरण को स्वच्छ बनाए रखने में मदद करते हैं, क्योंकि वे मृत जानवरों के शव खाकर दुर्गंन्ध एवं बीमारियों को फैलने से रोकते हैं।
  • संरक्षण स्थिति: गिद्धों को वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 की अनुसूची-I में शामिल किया गया है।
  • मुख्य खतरे: पर्यावास नष्ट होना, भोजन की कमी, डाइक्लोफेनेक जैसी दवाओं से विषाक्तता, बिजली के तारों से करंट लगना आदि।
  • संरक्षण उपाय: डाइक्लोफेनेक, केटोप्रोफेन और एसिक्लोफेनाक जैसी दवाओं पर प्रतिबंध; गिद्ध संरक्षण कार्य योजना (2020–25) का कार्यान्वयन आदि।
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