वैज्ञानिक तथा औद्योगिक अनुसंधान परिषद-राष्ट्रीय भौतिक प्रयोगशाला (CSIR-NPL) ने दो शीर्ष-स्तरीय अंशांकन सुविधाएं स्थापित की हैं: NESL तथा सौर सेल अंशांकन हेतु राष्ट्रीय प्राथमिक मानक सुविधा (National Primary Standard Facility for Solar Cell Calibration)।
- CSIR-NPL भारत में माप-विज्ञान (Metrology) के लिए शीर्ष संस्था है। साथ ही, यह भारत के राष्ट्रीय मानकों का संरक्षक भी है।
- सौर सेल अंशांकन हेतु राष्ट्रीय प्राथमिक मानक सुविधा की स्थापना से भारत फोटोवोल्टिक मापन मानकों के क्षेत्रक में विश्व के अग्रणी देशों के चुनिंदा समूह में शामिल हो गया है।
राष्ट्रीय पर्यावरण मानक प्रयोगशाला (NESL) के बारे में
- यह वायु प्रदूषण की निगरानी करने वाले उपकरणों के परीक्षण, अंशांकन और प्रमाणीकरण हेतु शीर्ष राष्ट्रीय सुविधा है।
- इसे विश्व की दूसरी NESL माना जाता है।
- वर्तमान में केवल यूनाइटेड किंगडम (UK) में ऐसी प्रयोगशाला है।
- लाभ: भारत-विशिष्ट मानकों के विकास, राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम (NCAP) के लिए विश्वसनीय आँकड़ों की उपलब्धता और औद्योगिक क्षेत्रक से उत्सर्जन का लेखा-परीक्षण में मदद मिलेगी।
राष्ट्रीय सुरक्षा गार्ड (NSG) की राष्ट्रीय IED डेटा प्रबंधन प्रणाली (NIDMS) का उद्घाटन किया गया।
NIDMS के बारे में:
- यह एक सुरक्षित राष्ट्रीय डिजिटल प्लेटफॉर्म है। इसके माध्यम से तात्कालिक विस्फोटक उपकरणों (Improvised Explosive Devices: IEDs) और बम विस्फोट से संबंधित घटनाओं का सटीक और व्यवस्थित तरीके से विश्लेषण किया जा सकता है।
- महत्व:
- यह प्रणाली घटनाओं के तरीकों का विश्लेषण करने, विभिन्न संगठनों के बीच डेटा साझा करने और जांच प्रक्रिया को तेज करने में मदद करती है।
- इस प्लेटफॉर्म का उपयोग अग्रलिखित एजेंसियां कर सकेंगी: राष्ट्रीय अन्वेषण अभिकरण (NIA), देशभर के आतंकवाद-रोधी दस्ते (ATS), राज्य पुलिस बल, सभी केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल (CAPFs)।
Article Sources
1 sourceशोधकर्ताओं ने पेंसिल से बने इलेक्ट्रोड और ग्राफीन ऑक्साइड (GO) का उपयोग करके कम लागत वाला और लचीला सेंसर विकसित किया है।
- इसे धातु से बने महंगे सेंसर्स के पर्यावरण-अनुकूल विकल्प के रूप में देखा जा रहा है।
- संभावित उपयोग: मृदा की नमी, पौधों में सूखा से जुड़े तनाव (ड्रॉट स्ट्रेस), मानव श्वसन प्रणाली आदि की उच्च संवेदनशीलता के साथ पता लगाने में।
- ग्राफीन ऑक्साइड (GO) का संश्लेषण ग्रेफाइट से किया जाता है। ग्रेफाइट, कार्बन का एक अपरूप (Allotrope) है।
ग्राफीन के बारे में
- इसे अद्भुत या चमत्कारी पदार्थ (Wonder Material / Miracle Material) भी कहा जाता है।
- संरचना: यह एक द्वि-आयामी (2D) षट्कोणीय जालिका (Hexagonal Lattice) में व्यवस्थित कार्बन परमाणुओं की एकल परत है।
- लचीलापन: इसमें उच्च प्रत्यास्थता (Elasticity) होती है; इसे इसकी मूल लंबाई के 20-25% तक खींचा जा सकता है।
- चालकता: तांबे से बेहतर विद्युत चालकता तथा किसी भी अन्य पदार्थ की तुलना में अधिक ऊष्मा चालकता।
- मजबूती: भार के अनुपात में यांत्रिक तन्य शक्ति (Mechanical tensile strength) इस्पात से लगभग 200 गुना अधिक।
- प्रमुख अनुप्रयोग: इलेक्ट्रॉनिक्स में प्रोसेसर की गति बढ़ाने, इलेक्ट्रिक वाहनों (EVs) के लिए बैटरी घनत्व में सुधार करने, जल शोधन व विलवणीकरण (desalination) हेतु फिल्टर को दक्ष बनाने में, आदि।
Article Sources
1 sourceनासा के एक उपग्रह के डेटा ने सुनामी के व्यवहार के बारे में हमारी पारंपरिक समझ को बदल दिया है।
- पहले यह माना जाता था कि सुनामी एक ही तरह की, स्थिर और अपरिवर्तित (Non-dispersive) गतिमान लहरें होती हैं। लेकिन अब नए अध्ययन के अनुसार सुनामी में कई लहरें होती हैं, जो आगे बढ़ते समय आपस में प्रभावित होती हैं और फैलती-बिखरती रहती हैं।
सुनामी के बारे में मुख्य तथ्य
- उत्पत्ति: सुनामी समुद्री जल के भीतर आने वाले भूकंपों या ज्वालामुखी उद्गारों के कारण उत्पन्न होने वाली विशाल लहरें हैं।
- गहरे महासागर में सुनामी लहरों की ऊंचाई नाटकीय रूप से नहीं बढ़ती है। हालांकि, जैसे-जैसे ये लहरें तट की ओर बढ़ती हैं और महासागर की गहराई कम होती जाती है, इनकी ऊंचाई अत्यधिक बढ़ जाती है।
- सुनामी लहरों की गति तरंग के स्रोत से दूरी की बजाय महासागर की गहराई पर निर्भर करती है।
भारत के विदेश मंत्री ने वाइमर ट्रायंगल के साथ भारत की पहली भागीदारी में हिस्सा लिया।
वाइमर ट्रायंगल के बारे में:
- यह फ्रांस, जर्मनी और पोलैंड का एक क्षेत्रीय गठबंधन है। इसकी स्थापना 1991 में जर्मनी के वाइमर शहर में हुई थी।
- शुरुआत में इसे मुख्य रूप से जर्मनी और पोलैंड के बीच सहभागिता बढ़ाने वाले एक मंच के रूप में बनाया गया था।
- मुख्य उद्देश्य:
- यूरोप के एकीकरण (European Integration) को बढ़ावा देना।
- राष्ट्रों के बीच राजनीतिक संवाद स्थापित करना।
- सुरक्षा क्षेत्रक में सहयोग को मजबूत करना, आदि।
हाल ही में, जम्मू-कश्मीर के जहानपोरा में स्तूपों (मानव निर्मित टीले) की खोज की गई है। यह खोज कश्मीर की समृद्ध गांधार-बौद्ध विरासत तथा बौद्ध संस्कृति एवं शिक्षा के केंद्र के रूप में इसके ऐतिहासिक महत्त्व को रेखांकित करती है।
जहानपोरा स्थल के बारे में:
- यह उत्तरी कश्मीर के बारामूला में स्थित है। ,
- यहां से मिली स्तूप संरचनाएं कुषाण काल (पहली से तीसरी शताब्दी ईस्वी) की हैं।
- यह स्थल कंधार की ओर जाने वाले प्राचीन रेशम मार्ग (Silk Route) पर स्थित है।
- अन्य महत्वपूर्ण खोजें:
- लकड़ी से निर्मित अधिरचनाओं (Wooden superstructures) के प्रमाण।
- एक नगरीय बस्ती परिसर, जिसमें संभावित रूप से चैत्य और विहार शामिल हैं।
- कुषाण युग के मृदभांड और तांबे की कलाकृतियां, आदि।
भारत ने शक्सगाम घाटी (Shaksgam Valley) में चीन की अवसंरचना परियोजनाओं पर औपचारिक रूप से आपत्ति दर्ज कराई है।
शक्सगाम घाटी के बारे में
- यह लद्दाख में काराकोरम जल-संभर (watershed) के उत्तर में सामरिक अवस्थिति वाला एक महत्वपूर्ण क्षेत्र है। यह भारत का अभिन्न अंग है।
- अवैध हस्तांतरण: यह क्षेत्र 1947 से पाकिस्तान के अवैध कब्जे में था। पाकिस्तान ने 1963 के 'चीन-पाकिस्तान सीमा समझौता' के तहत गैर-कानूनी तरीके से इसे चीन को स्थानांतरित कर दिया था।
- इसे काराकोरम-पार क्षेत्र (ट्रांस-काराकोरम ट्रैक्ट) के नाम से भी जाना जाता है। यह शक्सगाम नदी के दोनों किनारों पर फैला हुआ है।
- भौगोलिक विशेषताएँ:
- यह उत्तर में कुनलुन पर्वत और दक्षिण में काराकोरम पर्वतमाला से घिरा हुआ है।
- यह भौगोलिक रूप से सियाचिन ग्लेशियर के बिल्कुल निकट स्थित है।
हाल ही में, वैज्ञानिकों ने विश्व की पहली 2-टेराबिट्स प्रति सेकंड (2 Tbit/s) फ्री-स्पेस ऑप्टिकल (FSO) संचार प्रणाली को सफलतापूर्वक प्रदर्शित किया।
- इसके लिए उपग्रहों और हाई-एल्टीट्यूड प्लेटफॉर्म स्टेशनों (HAPS) पर लगाए जा सकने वाले लघु ऑप्टिकल टर्मिनलों का उपयोग किया गया।
फ्री-स्पेस ऑप्टिकल (FSO) संचार-प्रणाली के बारे में
- यह एक वायरलेस डेटा ट्रांसमिशन तकनीक है।
- इसमें ऑप्टिकल फाइबर या केबल का उपयोग किए बिना, खुले अंतरिक्ष (Free space) के माध्यम से डेटा प्रेषित करने के लिए मॉड्यूलेटेड लेजर या प्रकाश पुंज का उपयोग किया जाता है।
- लाभ: उच्च बैंडविड्थ, अत्यधिक तेज डेटा दर, अधिक सुरक्षित, स्पेक्ट्रम प्राप्त करने के लिए लाइसेंस की आवश्यकता नहीं।
- प्रमुख अनुप्रयोग:
- अंतरिक्ष में उपग्रहों के बीच संचार हेतु।
- उपग्रह से सीधे धरातल पर स्थित स्टेशन तक डेटा प्रेषित करने में।
- हाई-एल्टीट्यूड प्लेटफॉर्म स्टेशन (HAPS) से संचार हेतु।
- दुर्गम क्षेत्रों में इंटरनेट कनेक्टिविटी में।
- आपदा/आपात के समय संचार में।
- चुनौतियां: इसके लिए प्रेषक (Transmitter) और प्राप्तकर्ता (Receiver) के बीच प्रत्यक्ष और स्पष्ट रेखा होनी अनिवार्य है।
- सीमाएं: यह तकनीक कोहरा, बारिश, धूल और वायुमंडलीय व्यवधानों जैसे मौसम संबंधी कारकों से प्रभावित होती है। इससे सिग्नल कमजोर हो सकता है।