यह रिपोर्ट भारत के अपशिष्ट क्षेत्रक को 2070 के नेट जीरो लक्ष्य के अनुरूप बनाने के लिए महत्वपूर्ण अवसंरचनात्मक कमियों, सामाजिक बाधाओं और रणनीतिक मार्गों की पहचान करती है।
वर्तमान स्थिति और चुनौतियां
- उत्सर्जन में योगदान: 2020 में भारत के कुल उत्सर्जन में अपशिष्ट क्षेत्रक की हिस्सेदारी 2.56% थी।
- अवसंरचना की कमी: वर्तमान में देश का केवल 39% हिस्सा सीवर नेटवर्क से जुड़ा है, और केवल 44.9% सीवेज ही एकत्र व उपचारित किया जाता है।
- शहरी दबाव और अपशिष्ट की अधिक मात्रा: उदाहरण के लिए- 2050 तक शहरी आबादी के 53% तक पहुंचने का अनुमान है।
- 2020 में भारत में 100.9 मिलियन टन नगरपालिका ठोस अपशिष्ट और 221,173 मिलियन लीटर प्रतिदिन (MLD) घरेलू अपशिष्ट जल उत्पन्न हुआ था।
- अल्प प्रसंस्करण: उदाहरण के लिए- केवल 39% अपशिष्ट का ही वैज्ञानिक रूप से प्रसंस्करण किया जा रहा है।
- अन्य मुद्दे: अपशिष्ट के पृथक्करण की कमी; अनियंत्रित प्लास्टिक अपशिष्ट; अपशिष्ट प्रबंधन से जुड़ी सामाजिक हेय भावना; खंडित डेटा प्रणाली आदि।
परिवर्तन के मुख्य आधार
ठोस अपशिष्ट
- बायोमेथेनेशन (Bio-methanation): सामान्य खाद बनाने की बजाय वैज्ञानिक तरीकों को अपनाना चाहिए। उदाहरण के लिए- सूक्ष्मजीवों की उपस्थिति में अवायवीय स्थितियों (anaerobic conditions) के तहत जैविक अपशिष्ट को बायोगैस (मुख्य रूप से मीथेन) में बदलना।
- स्रोत पर पृथक्करण: 'स्वच्छ भारत 2.0' के अनुरूप लोगों के घरों से ही 100% अपशिष्ट पृथक्करण करना।
- जैवोपचार (Bioremediation): खुले वातावरण में सूक्ष्मजीवों का उपयोग करके "पुराने संचित अपशिष्ट” को साफ करना और खतरनाक अपशिष्ट को समाप्त या कम करना।
अपशिष्ट जल
- घरेलू अपशिष्ट जल: 2070 तक सीवर नेटवर्क कवरेज को 85% तक बढ़ाना चाहिए और मल गाद उपचार संयंत्रों (FSTPs) और सह-उपचार के माध्यम से 100% मल गाद उपचार सुनिश्चित करना चाहिए।
- औद्योगिक अपशिष्ट जल: 2035 तक विशेष रूप से उर्वरक, पेट्रोलियम और मत्स्य प्रसंस्करण क्षेत्रों में 'निकट-शून्य' मीथेन सुधार कारक (MCF) प्राप्त करने के लिए वायवीय प्रणालियों में सुधार करना चाहिए।
व्यवहारिक और संस्थागत बदलाव
- मिशन लाइफ/LiFE (पर्यावरण के लिए जीवन शैली): अपशिष्ट की उत्पत्ति को कम करने के लिए संधारणीय जीवन शैली को बढ़ावा देना चाहिए।
- अनौपचारिक क्षेत्रक का एकीकरण: अनौपचारिक रूप से कचरा बीनने वालों को औपचारिक मूल्य श्रृंखला में शामिल करना चाहिए।
- हरित वित्त-पोषण: सार्वजनिक-निजी भागीदारी (PPP), कार्बन क्रेडिट और ग्रीन बॉण्ड का लाभ उठाना चाहिए।