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In Summary

  • भारत के पास कोयले का पांचवां सबसे बड़ा भंडार (401 अरब टन) है और इसका लक्ष्य 2030 तक उत्पादन को बढ़ाकर 1.5 अरब टन करना है।
  • बिजली, इस्पात, सीमेंट और ऊर्जा सुरक्षा के 72% हिस्से के लिए कोयला अभी भी महत्वपूर्ण बना हुआ है, जिससे आयात में सालाना 8 अरब डॉलर की कमी आती है।
  • मिशन ग्रीन, कोयला गैसीकरण, एफएमसी, नवीकरणीय ऊर्जा का एकीकरण (2030 तक 22.5 गीगावाट) और टिकाऊ खदान बंद करने के ढांचे जैसी पहल कोयले के पर्यावरणीय प्रभाव को कम कर रही हैं।

In Summary

केंद्र सरकार ने वित्त वर्ष 2026-27 से शुरू होने वाली अगली पांच वर्षों की अवधि में कोयले और लिग्नाइट की खोज के लिए ₹5,925 करोड़ आवंटित किए हैं। 

  • साथ ही, सरकार कोयला आधारित ऊर्जा के प्रदूषणकारी प्रभाव को कम करने के लिए भी सक्रिय कदम उठा रही है।

भारत में कोयला क्षेत्रक की स्थिति

  • कोयला भंडार: भारत विश्व का 5वां सबसे बड़ा कोयला भंडार वाला देश है। अप्रैल 2025 तक के आंकड़ों के अनुसार भारत का कुल अनुमानित कोयला संसाधन लगभग 401 बिलियन टन है।
  • कोयला उत्पादन: यह वित्त वर्ष 2013-14 के 565.77 मिलियन टन (MT) से दोगुना होकर वित्त वर्ष 2024-25 में 1047.523 मिलियन टन हो गया है।
  • भविष्य का दृष्टिकोण: कोयले की मांग 2030 तक बढ़कर लगभग 1.5 बिलियन टन होने का अनुमान है।

भारत के लिए कोयला इतना महत्वपूर्ण क्यों है?

  • ऊर्जा का प्राथमिक स्रोत: कोयला आधारित ताप विद्युत संयंत्र अभी भी 72% विद्युत की आपूर्ति करते हैं। प्रदूषण संबंधी चुनौतियों के बावजूद, यह 24x7 एक विश्वसनीय 'बेस-लोड' सुनिश्चित करता है।
  • महत्वपूर्ण उद्योगों को समर्थन: कोयला इस्पात, सीमेंट और भारी उद्योगों को ऊर्जा प्रदान करता है, जो आर्थिक संवृद्धि को गति देते हैं। 
    • उदाहरण के लिए- यह राष्ट्रीय इस्पात नीति के तहत 2030 तक 300 मिलियन टन कच्चे इस्पात के उत्पादन के लक्ष्य के लिए केंद्रीय भूमिका निभाता है।
  • ऊर्जा सुरक्षा: घरेलू कोयला उत्पादन आयात को कम करता है। इससे 2024-25 में लगभग $8 बिलियन की बचत हुई है।
  • आर्थिक विकास: कोयला क्षेत्रक का विस्तार रोजगार सृजित करता है और बड़े निवेश को आकर्षित करता है।

कोयले के प्रदूषणकारी प्रभाव को कम करने के लिए उठाए गए कदम

  • मिशन ग्रीन (प्रकृति का विकास, पुनर्स्थापन, संवर्धन और सशक्तीकरण): इसका उद्देश्य कोयले के उपयोग व पर्यावरणीय संधारणीयता के बीच संतुलन स्थापित करना है।
  • कोयला गैसीकरण: इसके तहत कोयले को स्वच्छ गैस ईंधन में परिवर्तित किया जाता है। राष्ट्रीय कोयला गैसीकरण मिशन का लक्ष्य 2030 तक 100 मिलियन टन कोयले का गैसीकरण करना है।
  • फर्स्ट माइल कनेक्टिविटी (FMC): सड़क परिवहन से उड़ने वाली धूल और प्रदूषण को कम करने के लिए कोयले को कन्वेयर बेल्ट व रेल के माध्यम से खदानों से प्रेषण बिंदुओं तक पहुंचाना 
  • नवीकरणीय ऊर्जा समेकन: कोयला क्षेत्रक की सार्वजनिक कंपनियां (PSUs) हरित ऊर्जा को अपनाने की ओर बढ़ रही हैं। इनका लक्ष्य 2030 तक 22.5 गीगावाट (GW) नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता स्थापित करना है। वर्तमान में 2 गीगावाट से अधिक सौर ऊर्जा स्थापित की जा चुकी है।
  • संधारणीय खदान बंदी: खदानों को वैज्ञानिक तरीके से बंद करने और पारिस्थितिक पुनर्स्थापन सुनिश्चित करने के लिए LIVES (भूमि और तकनीकी सुधार) व RECLAIM जैसे नए फ्रेमवर्क शुरू किए गए हैं।
  • कार्बन प्रबंधन: खनन क्षेत्रक में कार्बन क्रेडिट के अवसरों को खोजने और हरित वित्त-पोषण को बढ़ावा देने के लिए ARTHA (संरेखित करना, क्रमबद्ध करना, लक्षित करना, उपयोग करना और अनुकूलित करना) फ्रेमवर्क प्रस्तुत किया गया है।
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ARTHA (संरेखित करना, क्रमबद्ध करना, लक्षित करना, उपयोग करना और अनुकूलित करना)

यह खनन क्षेत्र में कार्बन क्रेडिट के अवसरों को खोजने और हरित वित्त-पोषण को बढ़ावा देने के लिए प्रस्तुत एक ढांचा है, जो कार्बन प्रबंधन के विभिन्न पहलुओं को संबोधित करता है।

कार्बन क्रेडिट

कार्बन क्रेडिट उत्सर्जन की एक इकाई है जिसे एक देश या संगठन को कम करने के लिए आवंटित किया जाता है। यह एक बाजार-आधारित तंत्र है जिसका उद्देश्य ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को कम करना है।

RECLAIM

A framework designed for the scientific closure of mines, emphasizing ecological restoration and responsible management of post-mining landscapes.

Title is required. Maximum 500 characters.

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