रिपोर्ट में इस तथ्य पर जोर दिया गया है कि पृथ्वी अब 'वैश्विक जल दिवालियापन' के युग में प्रवेश कर चुकी है।
- जल दिवालियापन: यह मानव-जल प्रणाली की वह स्थायी संकट-पश्चात स्थिति है, जिसमें दीर्घकालिक जल उपयोग नवीकरणीय अंतर्वाहों (renewable inflows) और सुरक्षित निष्कर्षण सीमाओं से अधिक हो जाता है। इसके कारण जल संसाधनों का ऐसा क्षरण हुआ है, जिनका अब पुनर्भरण होना लगभग असंभव है।
- रिपोर्ट के अनुसार, जल और प्राकृतिक पूंजी के महत्वपूर्ण हिस्से {जैसे- नदियां, झीलें, जलभृत (aquifers), आद्रभूमियां, मृदा तथा ग्लेशियर} इतने क्षतिग्रस्त हो गए हैं कि उनके पूर्णतः पुनर्स्थापित होने की अब कोई वास्तविक संभावना नहीं बची है।
- जल दिवालियापन के विपरीत, जल तनाव ((water stress) वह स्थिति है, जिसमें जल आपूर्ति की तुलना में उसकी मांग अधिक होती है, लेकिन इसके प्रभावों का काफी हद तक निराकरण किया जा सकता है।
- जल संकट (water crisis) वह स्थिति है, जहां अचानक उत्पन्न होने वाली बाधाओं के कारण जल प्रणालियां अस्थायी रूप से अपनी क्षमता से अधिक हो जाती हैं, लेकिन आपातकालीन और पुनर्स्थापन उपायों के माध्यम से उन्हें बहाल किया जा सकता है।
जल दिवालियापन के लिए उत्तरदायी मुख्य कारक
- धीमी गति से होने वाला क्षय: सतही और भौमजल का लगातार अत्यधिक उपयोग धीरे-धीरे भंडारण एवं गुणवत्ता को खराब करता है। अक्सर शुरुआती चेतावनी संकेतों को तब तक नजरअंदाज किया जाता है, जब तक कि सुधार की सीमा पार न हो जाए।
- अवसंरचनाओं का अधिक विस्तार: बड़े बांध और जल स्थानांतरण परियोजनाएं संधारणीय सीमाओं से परे विस्तार को बढ़ावा देती हैं।
- पारिस्थितिक परिसमापन: आर्द्रभूमियों, बाढ़ के मैदानों, वनों और मृदा को इस तरीके से परिवर्तित या नष्ट किया जा रहा है, जिससे अल्पकालिक उत्पादकता तो बढ़ती है, लेकिन दीर्घकालिक जल भंडारण, निस्पंदन (filtration) और बफरिंग क्षमता समाप्त हो जाती है।
- जलवायु-प्रेरित संकट: जलवायु परिवर्तन विश्वसनीय आपूर्ति को कम करके तथा पहले से ही अत्यधिक शोषित जल प्रणालियों में अस्थिरता बढ़ाकर मौजूदा तनाव को और तीव्र कर देता है।
