संस्थागत अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था को चुनौती देता 'नव-राजतंत्रवाद' का उदय | Current Affairs | Vision IAS
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In Summary

  • विश्व राजनीति में नव-राजशाही और नव-सामंतवाद देखने को मिल रहा है, जिसमें ट्रंप जैसे नेता संस्थागत विदेश नीति से दूर हटने का प्रतीक हैं।
  • नव-राजशाही में सत्ता एक ऐसे नेता के हाथों में केंद्रित होती है जो वफादारों के माध्यम से शासन करता है, जबकि नव-सामंतवाद में सत्ता प्रौद्योगिकी दिग्गजों जैसे निजी संस्थाओं में विकेंद्रीकृत होती है।
  • उभरती चुनौतियों में नियम-आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था का क्षरण, आर्थिक उपकरणों का शस्त्रीकरण और राज्य संस्थाओं का कमजोर होना शामिल है।

In Summary

विश्व राजनीति वर्तमान में नव-राजतंत्रवाद (Neo-Royalism) और नव-सामंतवाद (Neo-Feudalism) के उदय की साक्षी बन रही है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प को रूस, चीन और तुर्की जैसे देशों में देखे जा रहे व्यापक बदलावों के प्रतीक के रूप में देखा जाता है।

  • 17वीं शताब्दी के बाद से और विशेष रूप से 19वीं एवं 20वीं शताब्दी के दौरान, विदेश नीति राजाओं का निजी उद्यम न रहकर एक तर्कसंगत व संस्थागत गतिविधि बन गई थी।
  • हालांकि, नौकरशाही के कमजोर होने, संभ्रांत वर्ग (elite) के अधिकार के क्षरण, अंतर्राष्ट्रीय तकनीकी दिग्गजों के उदय और वैयक्तिकृत राजनीति के वर्चस्व ने एक ऐसा बदलाव उत्पन्न किया है, जो हमारे आधुनिक-पूर्व (pre-modern) अतीत की याद दिलाता है।

नव-राजतंत्रवाद और नव-सामंतवाद

  • नव-राजतंत्रवाद: यह सत्ता का एक संप्रभु नेता के हाथों में केंद्रित होना है, जो संस्थाओं की बजाय अपने निष्ठावानों के माध्यम से शासन करता है। यह संस्थागत व नियम-आधारित अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था और बहुपक्षवाद को चुनौती देता है।
    • सत्ता ऐसे सामाजिक बंधनों के चारों-ओर लंबवत केंद्रित होती है, जो व्यक्तिगत निष्ठा और संबंधों से जुड़ी होती है। साधारण शब्दों में संप्रभु नेता अपने निष्ठावान लोगों व अधिकारियों के माध्यम से आदेशों को लागू करता है न कि संस्थाओं के माध्यम से।  
    • नीतियां संस्थागत राष्ट्रीय हितों की बजाय व्यक्तिगत प्राथमिकताओं, शिकायतों और संव्यवहार (transaction) से संचालित होती हैं।
  • नव-सामंतवाद: यह सत्ता को निजी संस्थाओं और अंतर्राष्ट्रीय नेटवर्क्स में विखंडित कर देता है। इससे राज्य का प्राधिकार कमजोर हो जाता है।
    • उदाहरण: डिजिटल स्पेस पर नियंत्रण रखने वाले तकनीकी दिग्गज, और स्टारलिंक या सोशल मीडिया जैसे प्लेटफॉर्म्स जो राजनीति, युद्ध व शांति को प्रभावित करते हैं।
    • यह मध्यकालीन व्यवस्था के समान है, जहां एक-दूसरे का अतिक्रमण करने वाले अधिकार-क्षेत्र होते थे।

नव-राजतंत्रवाद और नव-सामंतवाद से उभरती चुनौतियां

  • नियम-आधारित अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था का क्षरण: बहुपक्षीय संस्थाओं (जैसे- UN, WTO, NATO आदि) का कमजोर होना, क्योंकि नेता व्यक्तिगत प्राधिकार को प्राथमिकता देते हैं।
    • उदाहरण: अमेरिका का 66 अंतर्राष्ट्रीय संगठनों से बाहर निकलना।
  • आर्थिक साधनों का शस्त्रीकरण: टैरिफ, प्रतिबंध और बाजार पहुंच का उपयोग दबाव बनाने के उपकरण के रूप में किया जाता है। इससे वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला और आर्थिक स्थिरता के समक्ष खतरा उत्पन्न होता है।
  • राज्य की संस्थाओं का कमजोर होना: नौकरशाही की स्वायत्तता और विधायिका व अन्य संस्थाओं द्वारा विशेषज्ञ-आधारित निर्णय लेने की प्रक्रिया में गिरावट आती है।
  • निजी सत्ता का उदय: तकनीकी कंपनियां और डिजिटल प्लेटफॉर्म्स डेटा व विचारधारात्मक दृष्टिकोण के माध्यम से 'अर्ध-संप्रभु' प्रभाव उत्पन्न करते हैं।
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अर्ध-संप्रभु (Semi-sovereign)

यह शब्द उन निजी संस्थाओं या समूहों को संदर्भित करता है जो महत्वपूर्ण प्रभाव और शक्ति रखते हैं, जो एक संप्रभु राज्य की तरह कार्य करने की क्षमता देते हैं, भले ही वे औपचारिक रूप से राज्य के भीतर हों।

आर्थिक साधनों का शस्त्रीकरण (Weaponization of Economic Tools)

यह एक ऐसी रणनीति है जहाँ टैरिफ, प्रतिबंध और बाजार पहुंच जैसे आर्थिक साधनों का उपयोग राजनीतिक दबाव बनाने या अन्य देशों की नीतियों को प्रभावित करने के लिए किया जाता है।

बहुपक्षीय संस्थाएं (Multilateral Institutions)

ये वे अंतर्राष्ट्रीय संगठन हैं जिनमें कई देश सदस्य होते हैं और जो वैश्विक मुद्दों पर सहयोग और समन्वय स्थापित करने के लिए काम करते हैं। उदाहरणों में संयुक्त राष्ट्र (UN), विश्व व्यापार संगठन (WTO) और नाटो (NATO) शामिल हैं।

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