ध्रुवीय भंवर (Polar Vortex) के दक्षिण की ओर विस्तार के कारण संयुक्त राज्य अमेरिका में अत्यधिक ठंड की स्थिति देखी जा रही है | Current Affairs | Vision IAS
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In Summary

  • ध्रुवीय भंवर ध्रुवीय क्षेत्रों में अत्यधिक ठंडी हवा का एक निम्न दबाव वाला क्षेत्र है, जो ध्रुवीय-मोर्चे वाली जेट स्ट्रीम द्वारा घिरा होता है।
  • एक स्थिर भंवर ठंडी हवा को उत्तर की ओर रखता है, जबकि एक कमजोर, लहरदार भंवर दक्षिणी क्षेत्रों में अत्यधिक ठंड ला सकता है।
  • हालांकि आर्कटिक की हवाएं, जो ध्रुवीय भंवर से प्रभावित होती हैं, भारत को सीधे तौर पर प्रभावित नहीं करती हैं, लेकिन वे पश्चिमी विक्षोभ जैसी मौसम प्रणालियों को प्रभावित कर सकती हैं।

In Summary

ध्रुवीय भंवर (Polar Vortex) के बारे में

  • परिभाषा: ध्रुवीय भंवर एक बड़ा और स्थायी निम्न दाब वाला क्षेत्र है। इसमें अत्यधिक ठंडी वायु राशि होती है। यह पोलर-फ्रंट जेट स्ट्रीम द्वारा ध्रुवीय क्षेत्रों के भीतर सीमित रहता है।
    • पोलर-फ्रंट जेट स्ट्रीम: यह पूर्व की ओर बढ़ने वाली तीव्र वेग युक्त समतापमंडलीय (stratospheric) हवाओं की एक पट्टी है। यह पट्टी मध्य-अक्षांशों में गर्म उष्णकटिबंधीय हवा को ठंडी ध्रुवीय हवा से अलग करती है।
  • घूर्णन की दिशा: यह उत्तरी ध्रुव पर वामावर्त (counter-clockwise) और दक्षिणी ध्रुव पर दक्षिणावर्त (clockwise) घूमता है।
  • निर्माण के उत्तरदायी कारक: 
    • तापमान प्रवणता (ठंडे ध्रुवीय और गर्म उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों के बीच); 
    • पृथ्वी का घूर्णन (कोरिओलिस बल);
    • दबाव प्रवणता बल; और 
    • जेट स्ट्रीम की परस्पर क्रिया।
  • स्थिरता: जब यह भंवर मजबूत और स्थिर होता है, तो यह जेट स्ट्रीम को एक तंग, व गोलाकार पथ पर बनाए रखता है। इससे ठंडी हवा उत्तर में फंसी रहती है और गर्म हवा दक्षिण की ओर प्रवाहित होती है।
    • अस्थिरता: जब यह कमजोर हो जाता है, तो यह लहरदार (wavy) हो जाता है। इससे दक्षिण में अत्यधिक ठंड की स्थिति उत्पन्न हो जाती है।
  • ध्रुवीय भंवर के प्रकार
    • क्षोभमंडलीय ध्रुवीय भंवर: यह 10 किमी से 15 किमी की ऊंचाई पर निर्मित होता है, जहां मौसम संबंधी अधिकतर घटनाएं घटित होती हैं।
    • समतापमंडलीय (Stratospheric) ध्रुवीय भंवर: यह 15-50 किमी की ऊंचाई पर बनता है। यह सर्दियों के मौसम में सबसे मजबूत होता है।

ध्रुवीय भंवर के प्रभाव

  • ठंडा मौसम: ऐसा माना जाता है कि आर्कटिक के तेजी से गर्म होने (आर्कटिक प्रवर्धन/Arctic amplification) के कारण ध्रुवों और मध्य-अक्षांशों के बीच तापमान का अंतर कम हो रहा है। इससे भंवर अधिक अस्थिर हो सकता है, जिससे गंभीर शीत लहरों की आवृत्ति बढ़ सकती है।
  • ओज़ोन का क्ष्रय (Ozone depletion): भंवर में फंसी ठंडी हवा विशेष रूप से अंटार्कटिका के ऊपर ओज़ोन क्षरण को तीव्र करती है। इससे ओज़ोन छिद्र बनता है।
  • भारत पर प्रभाव: ध्रुवीय भंवर और भारतीय मौसम के बीच कोई प्रत्यक्ष संबंध नहीं है, लेकिन आर्कटिक हवाएं पश्चिमी विक्षोभ (Western Disturbance) सहित विभिन्न मौसम प्रणालियों को प्रभावित कर रही हैं।
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पश्चिमी विक्षोभ (Western Disturbance)

यह भूमध्य सागर, अटलांटिक और कभी-कभी यूरोपीय क्षेत्रों से उत्पन्न होने वाली पूर्व की ओर बढ़ने वाली अतिरिक्त-उष्णकटिबंधीय तूफानी प्रणालियाँ हैं, जो भारतीय उपमहाद्वीप पर सर्दियों की वर्षा और कभी-कभी बर्फबारी लाती हैं।

ओज़ोन छिद्र (Ozone Hole)

समताप मंडल में ओज़ोन परत का पतला होना, जो ध्रुवीय भंवर में फंसी ठंडी हवा और रासायनिक प्रतिक्रियाओं के कारण तीव्र हो सकता है, विशेष रूप से अंटार्कटिका के ऊपर।

आर्कटिक प्रवर्धन (Arctic Amplification)

यह आर्कटिक क्षेत्र के शेष विश्व की तुलना में अधिक तेजी से गर्म होने की घटना है, जिसके कारण ध्रुवों और मध्य-अक्षांशों के बीच तापमान का अंतर कम हो सकता है।

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