भारत के पर्यावरण कानूनों का कमजोर होना | Current Affairs | Vision IAS

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In Summary

  • पर्यावरण संबंधी नियमों को व्यवस्थित रूप से कमजोर किया जा रहा है, जिससे ईआईए प्रक्रियाओं और न्यायिक मिसालों पर असर पड़ रहा है।
  • न्यायिक निर्णयों ने अरावली पहाड़ियों और मैंग्रोव जैसे पारिस्थितिक रूप से महत्वपूर्ण क्षेत्रों के लिए सुरक्षा उपायों को कमजोर कर दिया है।
  • वर्तमान रुझान संवैधानिक प्रावधानों और सार्वजनिक विश्वास सिद्धांत को कमजोर करने का जोखिम पैदा करते हैं, जिससे स्वस्थ पर्यावरण के अधिकार पर असर पड़ता है।

In Summary

हालिया दिनों में, पर्यावरण संरक्षण में व्यवस्थित रूप से "कमी" देखी गई है। इसके कुछ उदाहरण हैं; प्रगतिशील न्यायिक निर्णयों को वापस लेना और संरक्षित क्षेत्रों (जैसे अरावली पहाड़ियों) के लिए संकुचित परिभाषाओं को अपनाना है।

पर्यावरण विनियमन का व्यवस्थित क्षरण

  • EIA प्रक्रिया का कमजोर होना: 18 दिसंबर, 2025 से, गैर-कोयला खनन परियोजनाओं के लिए, पर्यावरण प्रभाव आकलन (EIA) से पहले भूमि अधिग्रहण किया जा सकता है। इसके अलावा, अवस्थिति और क्षेत्र के विशिष्ट विवरणों के बिना भी EIA संपन्न किए जा सकते हैं।
  • न्यायिक निर्णयों की वापसी: वनशक्ति बनाम भारत संघ (2025) के फैसले को वापस लेने से 'पूर्वप्रभावी मंजूरी' (retrospective clearances) पर लगा प्रतिबंध कमजोर हो गया है। यह पर्यावरण-समर्थक न्यायशास्त्र से पीछे हटने का संकेत है।
  • अरावली पहाड़ियों से संबंधित विवाद: न्यायालय ने 100 मीटर की ऊंचाई-आधारित परिभाषा को स्वीकार किया। इससे कई महत्वपूर्ण पारिस्थितिक क्षेत्र संरक्षण के दायरे से बाहर हो गए। यह संविधान के अनुच्छेद 21 का उल्लंघन है और अनुच्छेद 48A को कमजोर करता है।
    • अनुच्छेद 21: प्राण एवं दैहिक स्वतंत्रता का संरक्षण। 
    • अनुच्छेद 48A: पर्यावरण का संरक्षण व संवर्धन संबंधी राज्य का कर्तव्य। 
  • मैंग्रोव और तटीय पारिस्थितिकी: मैंग्रोव के विनाश के लिए न्यायिक स्वीकृति (जैसे- अडाणी सीमेंटेशन लिमिटेड के लिए रायगढ़, महाराष्ट्र में) 'प्रतिपूरक वनीकरण' (compensatory afforestation) पर निर्भरता दर्शाती है। यह पारिस्थितिकी विज्ञान की अनदेखी करता है।
  • सामरिक रक्षा बनाम पारिस्थितिकी: न्यायालय ने क्षेत्र के पारिस्थितिक महत्त्व को स्वीकार करने के बावजूद सामरिक रक्षा आवश्यकताओं के आधार पर सड़कों को चौड़ा करने की अनुमति दी (सिटीजन्स फॉर ग्रीन दून बनाम भारत संघ, 2021 वाद)। 
    • इस "संतुलनकारी कार्य" को उत्तराखंड में आने वाली आकस्मिक बाढ़ और पारिस्थितिकी गड़बड़ी से जोड़कर देखा गया है।

संवैधानिक और न्यायिक निहितार्थ

  • जोखिम में संवैधानिक प्रावधान: अनुच्छेद 14 (गैर-मनमानेपन और कानून के समक्ष समानता का सिद्धांत), अनुच्छेद 21 (स्वच्छ एवं स्वस्थ पर्यावरण का अधिकार), तथा अनुच्छेद 51A(g) (पर्यावरण की रक्षा करना नागरिकों का मौलिक कर्तव्य)।
  • 'सार्वजनिक न्यास सिद्धांत' का क्षरण: यह सिद्धांत एम.सी. मेहता बनाम कमल नाथ वाद (1996) में स्थापित किया गया था। यह स्पष्ट करता है कि प्राकृतिक संसाधन जनता के विश्वास में राज्य के पास अमानत हैं और इन्हें निजी दोहन के लिए नहीं बेचा जा सकता।
    • वर्तमान में पर्यावरण क्षरण को मंजूरी देने वाले न्यायिक रुझान इस बुनियादी न्यायशास्त्र के विपरीत प्रतीत होते हैं।
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सार्वजनिक न्यास सिद्धांत (Public Trust Doctrine)

The Public Trust Doctrine, established in Indian environmental law through cases like M.C. Mehta v. Kamal Nath, posits that natural resources are held by the State in trust for the benefit of the public and cannot be alienated for private exploitation.

अनुच्छेद 51A(g) (भारत का संविधान)

Article 51A(g) of the Indian Constitution outlines the fundamental duty of every citizen to protect and improve the natural environment, including forests, lakes, rivers, and wildlife, and to have compassion for living creatures.

सामरिक रक्षा

Strategic defence refers to measures taken for national security and military preparedness. The article discusses how strategic defence needs have sometimes been prioritized over ecological concerns, leading to infrastructure development that impacts the environment.

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