बंधुआ मजदूरी प्रणाली (उत्सादन) अधिनियम फरवरी 1976 में लागू किया गया था। यह भारतीय समाज में समानता की दिशा में एक महत्वपूर्ण साधन सिद्ध हुआ है।
बंधुआ मजदूरी के खिलाफ संवैधानिक और कानूनी ढांचा
- संवैधानिक: भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21, 23 और 24 बंधुआ मजदूरी के खिलाफ सुरक्षा प्रदान करते हैं।
- कानूनी: बंधुआ मजदूरी प्रणाली (उत्सादन) अधिनियम 1976 इस कुप्रथा को समाप्त करता है। वहीं भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 143 तस्करी और जबरन श्रम को दंडनीय बनाती है।
बंधुआ मजदूरी प्रणाली (उत्सादन) अधिनियम, 1976 के तहत की गई कानूनी कार्रवाइयां व प्रावधान
- पूर्ण उन्मूलन: इसने बंधुआ मजदूरी प्रणाली को पूरी तरह से समाप्त कर दिया और इसके सभी रूपों को अवैध घोषित कर दिया।
- कर्ज मुक्ति: इस कानून के तहत सभी मौजूदा बंधुआ मजदूरों पर ऋणों को रद्द कर दिया गया है और सभी बंधुआ मजदूरों की तत्काल रिहाई एवं स्वतंत्रता का आदेश दिया गया है।
- बेदखली से सुरक्षा: मुक्त कराए गए बंधुआ मजदूरों को उनके अधिकार वाली जमीनों से बेदखल होने से सुरक्षा दी गई है।
- जिला-स्तरीय प्रवर्तन: बंधुआ मजदूरों की पहचान, रिहाई और पुनर्वास के लिए जिला मजिस्ट्रेट तथा सतर्कता समितियों द्वारा कानून प्रवर्तन का प्रावधान किया गया है।
- पुनर्वास: केंद्रीय और राज्य स्तरीय कार्यक्रमों के माध्यम से वित्तीय सहायता, भूमि, आवास और आजीविका सहायता प्रदान की जाती है।
- बचाव अभियान: समय-समय पर किए जाने वाले सर्वेक्षणों और बचाव अभियानों के माध्यम से दशकों में लाखों बंधुआ मजदूरों की पहचान कर उन्हें मुक्त कराया गया है।
बंधुआ मजदूरी अभी भी क्यों बनी हुई है?
- आर्थिक और संरचनात्मक कारक: निरंतर गरीबी, औपचारिक अनुबंधों का अभाव और अनौपचारिक क्षेत्रक में कमजोर विनियमन शोषणकारी कार्यों को बढ़ावा देते हैं।
- सामाजिक असमानता: जातिगत पदानुक्रम और भेदभाव के कारण SC/ST समुदाय असमान रूप से प्रभावित होते हैं।
- डेटा से पता चलता है कि 1978 से अब तक केवल लगभग 3,00,000 लोगों को ही मुक्त/पुनर्वासित किया गया है, जो कानून प्रवर्तन में कमी का संकेत देता है।
- न्यायिक बाधाएं: कम दोषसिद्धि दर और पीड़ित-केंद्रित दृष्टिकोण की कमी कानून का उल्लंघन करने वालों के मन में भय उत्पन्न करने में विफल रहती है।
निष्कर्ष
बंधुआ मजदूरी के पूरी तरह से उन्मूलन के लिए कानूनी सुधारों, मजबूत निगरानी, पुनर्वास सहायता और सामाजिक जागरूकता के साथ समन्वय वाली रणनीति आवश्यक है। निरंतर राजनीतिक इच्छाशक्ति और सामुदायिक भागीदारी ही स्थायी परिवर्तन के वास्तविक निर्धारक होंगे।