भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) ने विदेशी मुद्रा प्रबंधन (उधार लेना और ऋण देना) (प्रथम संशोधन) विनियम, 2026 के माध्यम से बाह्य वाणिज्यिक उधारियों (ECBs) पर संशोधित दिशा-निर्देश जारी किए हैं।
- RBI ने विदेशी मुद्रा प्रबंधन अधिनियम, 1999 के तहत प्राप्त शक्तियों का प्रयोग करते हुए विदेशी मुद्रा प्रबंधन (उधार लेना और देना) विनियम, 2018 में ये संशोधन किए हैं।
बाह्य वाणिज्यिक उधारियों (ECBs) के बारे में
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ECB फ्रेमवर्क
- पात्र उधारकर्ता: केंद्र या राज्य कानून के तहत निगमित कोई भी गैर-व्यक्तिगत निवासी संस्था (Non-individual resident entity) अब वैधानिक अनुमति के अधीन विदेशी ऋण लेने के लिए पात्र है।
- उधार सीमा और परिपक्वता (Maturity) में वृद्धि:
- उच्चतर सीमा: पात्र कंपनियां अब 1 बिलियन डॉलर तक या अपनी नेटवर्थ का 300% तक ECBs जुटा सकती हैं।
- परिपक्वता अवधि: सामान्य न्यूनतम औसत परिपक्वता अवधि 3 वर्ष निर्धारित की गई है।
- विनिर्माण क्षेत्रक के उधारकर्ताओं को कुछ शर्तों के तहत 1 से 3 वर्ष की कम औसत परिपक्वता अवधि की अनुमति है।
- ECB का गैर-ऋण साधन में परिवर्तन: ECB को गैर-ऋण साधन में बदला जा सकता है। इसमें परिपक्व लेकिन भुगतान न की गई बाह्य वाणिज्यिक उधारी भी शामिल हैं। यह परिवर्तन विदेशी मुद्रा प्रबंधन (गैर-ऋण लिखत) नियम, 2019 के अनुसार होना चाहिए।
- आर्म्स लेंथ सिद्धांत: संबंधित पक्ष से लिया गया ECB 'आर्म्स लेंथ' आधार पर होना चाहिए।
- आर्म्स लेंथ सिद्धांत का अर्थ: दो संबंधित पक्षों के बीच का लेन-देन इस तरह से आयोजित किया जाता है जैसे कि वे असंबंधित हों, ताकि हितों का कोई टकराव न हो।
- अंतिम उपयोग पर प्रतिबंध: ECB धन का उपयोग निम्नलिखित के लिए नहीं किया जा सकता:
- चिट फंड या निधि कंपनियां।
- शेयर बाजार में निवेश, आदि।