2025 तक, भारत ने सक्रिय विभिन्न मुक्त व्यापार समझौते (FTAs) संपन्न किए हैं, जो भारत को वैश्विक व्यापार के लगभग दो-तिहाई हिस्से तक अधिमान्य (Preferential) पहुंच प्रदान करते हैं।
मुक्त व्यापार समझौतों (FTAs) के बारे में
- परिभाषा: FTAs दो या दो से अधिक देशों के बीच कानूनी रूप से बाध्यकारी संधियां हैं। इनका उद्देश्य व्यापार बाधाओं जैसे कि प्रशुल्क (टैरिफ), कोटा और आयात-निर्यात पर प्रतिबंधों को कम करना या समाप्त करना है।
- दायरा: इन समझौतों में अक्सर व्यापार सुविधा, बौद्धिक संपदा अधिकार और निवेश संरक्षण के प्रावधान शामिल होते हैं।
- भारत के FTA साझेदार: संयुक्त राज्य अमेरिका (USA), यूनाइटेड किंगडम (UK), ऑस्ट्रेलिया, संयुक्त अरब अमीरात (UAE), ओमान, न्यूजीलैंड, जापान, सिंगापुर, दक्षिण कोरिया, श्रीलंका, नेपाल, भूटान, थाईलैंड और मलेशिया।
- क्षेत्रीय समूह: यूरोपीय संघ (EU), यूरोपीय मुक्त व्यापार संघ (EFTA), आसियान (ASEAN) और सार्क (SAARC)।
- चल रही वार्ताएं: खाड़ी सहयोग परिषद (GCC), इजरायल, चिली, कनाडा, पेरू, बांग्लादेश, मालदीव, कतर, यूरेशियाई आर्थिक संघ (EAEU) और बहरीन के साथ।

FTAs का महत्त्व
- व्यापार विविधीकरण: FTAs भारत को अपने निर्यात और आयात बाजारों का भौगोलिक रूप से विविधीकरण करने; निर्यात के मूल्य को बढ़ाने और आयात बाधाओं को कम करने में सक्षम बनाएंगे।
- भारतीय उद्योग का एकीकरण: ये भारत को वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं के साथ बेहतर ढंग से जोड़ने; विकसित बाजारों में भारतीय व्यवसायों की प्रतिस्पर्धात्मकता बढ़ाने और रोजगार उत्पन्न करने में मदद करते हैं।
- भू-राजनीतिक रणनीति: ये साझेदारों के साथ व्यापक विश्वास सृजित करने में मदद करते हैं और बहु-संरेखित विदेश नीति में योगदान देते हैं।
- संसाधनों का इष्टतम उपयोग: FTAs के तहत, प्रत्येक देश उन वस्तुओं का उत्पादन करता है, जिनमें उसके पास सबसे अच्छा लाभ या विशेषज्ञता होती है।