भारतीय वैज्ञानिकों ने कोरोनल मास इजेक्शन (CME) द्वारा उत्पन्न शॉक वेव्स का पर्यवेक्षण किया | Current Affairs | Vision IAS

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In Summary

  • गौरीबिदानूर रेडियो टेलीस्कोप और आदित्य एल1 के वीईएलसी का उपयोग करके कोरोनल मास इजेक्शन (सीएमई) की खोज।
  • सीएमई सौर प्लाज्मा और चुंबकीय क्षेत्रों के विशाल विस्फोट होते हैं, जो भूचुंबकीय तूफान पैदा कर सकते हैं और प्रौद्योगिकी को बाधित कर सकते हैं।
  • भारत का पहला सौर मिशन, आदित्य एल1, एल1 लैग्रेंज बिंदु से सूर्य की बाहरी परतों का अवलोकन करता है।

In Summary

यह खोज भारतीय खगोल भौतिकी संस्थान (IIA) के गौरीबिदानूर रेडियो टेलीस्कोप और आदित्य-L1 पर लगे विजिबल एमिशन लाइन कोरोनाग्राफ (VELC) का उपयोग करके की गई है।

  • गौरीबिदानूर वर्तमान में भारत की एकमात्र समर्पित निम्न-आवृत्ति वाली सौर रेडियो वेधशाला है।

कोरोनल मास इजेक्शन (CME) के बारे में

  • कोरोनल मास इजेक्शन सौर प्लाज्मा, आवेशित कणों (जैसे इलेक्ट्रॉन व प्रोटॉन) और चुंबकीय क्षेत्रों का एक विशाल विस्फोट है, जो सूर्य के बाहरी वातावरण (कोरोना) से उत्सर्जित होता है।
  • प्रभाव: तेजी से उत्पन्न होने वाले CMEs ऐसी शॉक वेव्स सृजित करते हैं, जो पृथ्वी के मैग्नेटोस्फीयर (चुंबकीय मंडल) को संकुचित कर सकती हैं। इससे भू-चुंबकीय तूफान आते हैं जो उपग्रहों, जीपीएस प्रणालियों, रेडियो संचार और यहां तक कि पावर ग्रिड को भी बाधित कर सकते हैं।
    • ये ध्रुवीय ज्योतियों (ऑरोरा/auroras) को तीव्र कर सकते हैं और अंतरिक्ष यात्रियों तथा उच्च-ऊंचाई वाली उड़ानों के लिए विकिरण का खतरा बढ़ा सकते हैं।
  • उत्पत्ति: CMEs कोरोना में सूर्य के चुंबकीय क्षेत्र में होने वाले परिवर्तनों के कारण होते हैं।
    • जब मुड़ी हुई चुंबकीय क्षेत्र रेखाएं अचानक फिर से जुड़ती हैं, तो वे विशाल मात्रा में ऊर्जा निर्मुक्त करती हैं और सौर सामग्री को अंतरिक्ष में उत्सर्जित कर देती हैं।
    • CMEs 'सोलर मैक्सिमम’ के दौरान सबसे सामान्य होते हैं। इस समय सौर कलंक चक्र सबसे अधिक सक्रिय होता है। 
    • ये अक्सर सौर ज्वालाओं (solar flares) से जुड़े होते हैं, लेकिन स्वतंत्र रूप से भी हो सकते हैं।

आदित्य-L1 के बारे में

  • यह भारत का पहला समर्पित सौर मिशन है। इसका उद्देश्य विद्युत चुंबकीय और कण व चुंबकीय क्षेत्र डिटेक्टर्स का उपयोग करके सूर्य के फोटोस्फीयर, क्रोमोस्फीयर और सबसे बाहरी परतों (कोरोना) का निरीक्षण करना है।
  • प्रक्षेपण: 2023 में PSLV-C57 द्वारा।
  • पेलोड: इसमें 7 पेलोड हैं (सभी स्वदेशी रूप से विकसित)।
  • स्थान: इसे सूर्य-पृथ्वी प्रणाली के लैग्रेंज बिंदु 1 (L1) के चारों ओर एक 'प्रभामण्डल कक्षा' (halo orbit) में रखा गया है, जो पृथ्वी से लगभग 15 लाख किलोमीटर दूर है।
    • लैग्रेंज बिंदु 1 (L1): लैग्रेंज पॉइंट्स पर दो विशाल द्रव्यमान वाले पिंडों का गुरुत्वाकर्षण खिंचाव और किसी छोटे पिंड को उनके साथ-साथ घूमने के लिए आवश्यक अभिकेंद्रीय बल, दोनों बराबर होते हैं। इस प्रकार, यहां पर स्थापित उपग्रह अपने नियत बिंदु पर बने रहते है।
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प्रभामंडल कक्षा (halo orbit)

एक जटिल कक्षा है जो विशेष रूप से लैग्रेंज बिंदुओं के आसपास स्थित खगोलीय पिंडों के लिए उपयोग की जाती है, जहाँ उपग्रह एक स्थिर स्थिति में बना रहता है।

लैग्रेंज बिंदु 1 (L1)

सूर्य-पृथ्वी प्रणाली में एक ऐसा बिंदु है जहाँ सूर्य और पृथ्वी का गुरुत्वाकर्षण खिंचाव एक दूसरे को संतुलित करता है, जिससे वहां स्थित उपग्रह अपनी स्थिति बनाए रख सकता है।

PSLV-C57

The specific variant of the Polar Satellite Launch Vehicle (PSLV) used by ISRO to launch the Aditya-L1 mission in 2023.

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