उच्चतम न्यायालय ने समान नागरिक संहिता (UCC) के लिए समर्थन दोहराया | Current Affairs | Vision IAS

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  • सुप्रीम कोर्ट ने यूसीसी को व्यक्तिगत कानूनों में लैंगिक पूर्वाग्रह को दूर करने का सुझाव दिया, जिसका उद्देश्य सभी नागरिकों के लिए एक समान कानून स्थापित करना था।
  • अनुच्छेद 44 राज्य को समवर्ती सूची में विवाह और उत्तराधिकार सहित यूसीसी के लिए प्रयास करने का निर्देश देता है।
  • उत्तराखंड यूसीसी लागू करने वाला पहला राज्य है; गोवा में 1867 से एक समान नागरिक संहिता लागू है; 21वें विधि आयोग ने इस स्तर पर यूसीसी को अनावश्यक माना।

In Summary

हाल ही में, पाविनी शुक्ला बनाम भारत संघ मामले में उच्चतम न्यायालय ने व्यक्तिगत कानूनों (Personal Laws) में व्याप्त लैंगिक भेदभाव को दूर करने के लिए UCC का सुझाव दिया है।

समान नागरिक संहिता (UCC) के बारे में

  • इसका उद्देश्य धर्म, जाति, पंथ, लिंग या लैंगिक रुझान के भेदभाव के बिना, सभी नागरिकों के लिए धर्म-आधारित व्यक्तिगत कानूनों को एक समान कानून से बदलना है।
  • संवैधानिक प्रावधान:
    • अनुच्छेद 44: यह राज्य को भारत के संपूर्ण क्षेत्र में नागरिकों के लिए एक समान नागरिक संहिता सुरक्षित करने का प्रयास करने का निर्देश देता है।
    • संघीय स्थिति: विवाह, तलाक, बच्चों को गोद लेना और उत्तराधिकार समवर्ती सूची (7वीं अनुसूची) का हिस्सा हैं। इन विषयों पर केंद्र और राज्य दोनों कानून बना सकते हैं।

UCC की आवश्यकता क्यों है?

  • लैंगिक न्याय सुनिश्चित करना: UCC व्यक्तिगत कानूनों में भेदभावपूर्ण प्रथाओं को समाप्त करता है।
  • पंथनिरपेक्षता को बढ़ावा देना: UCC यह सुनिश्चित करता है कि नागरिक कानून धार्मिक मान्यताओं से प्रभावित न हों, जिससे पंथनिरपेक्षता के सिद्धांत का पालन हो सके।
  • कानूनी प्रक्रियाओं का सरलीकरण: विवाह, तलाक और विरासत से संबंधित कानूनी प्रक्रियाओं को सरल बनाता है।
  • राष्ट्रीय एकता को बढ़ावा: धार्मिक और सामुदायिक विभाजनों से ऊपर उठकर, UCC साझा नागरिकता को बढ़ावा देता है और राष्ट्रीय एकता को मजबूत करता है।

भारत में UCC की वर्तमान स्थिति

  • उत्तराखंड स्वतंत्र भारत में UCC लागू करने वाला पहला और एकमात्र राज्य बन गया है।
  • गोवा में 1867 के 'पुर्तगाली नागरिक संहिता' के रूप में एक समान नागरिक संहिता पहले से ही चलन में है।
  • वर्तमान में, भारत में कोई राष्ट्रव्यापी UCC लागू नहीं है।
    • उच्चतम न्यायालय ने विभिन्न निर्णयों जैसे शाह बानो (1985) और सरला मुद्गल (1995) में UCC को लागू करने का आह्वान किया है।
  • 21वें विधि आयोग (2018) ने अपने एक परामर्श पत्र में कहा था कि इस चरण में UCC का निर्माण न तो आवश्यक है और न ही वांछनीय। इसकी बजाय उन्होंने प्रत्येक धर्म के पारिवारिक कानूनों में सुधार करने पर जोर दिया, ताकि उन्हें लैंगिक रूप से न्यायपूर्ण बनाया जा सके।
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21वें विधि आयोग

भारत का एक विधि आयोग जिसने 2018 में एक परामर्श पत्र जारी किया था। इसने उस समय UCC को लागू करने को न तो आवश्यक और न ही वांछनीय बताया था, और इसके बजाय प्रत्येक धर्म के पारिवारिक कानूनों में सुधार का सुझाव दिया था।

सरला मुद्गल मामला (1995)

इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने यह माना था कि विवाह, तलाक और भरण-पोषण के मामलों में विभिन्न व्यक्तिगत कानूनों को समान नागरिक संहिता (UCC) के दायरे में लाया जाना चाहिए।

शाह बानो मामला (1985)

यह एक ऐतिहासिक सुप्रीम कोर्ट का फैसला था जिसने मुस्लिम महिला के भरण-पोषण के अधिकार पर फैसला सुनाया था और समान नागरिक संहिता (UCC) की आवश्यकता पर जोर दिया था।

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