उच्चतम न्यायालय ने पहली बार निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) फ्रेमवर्क लागू किया | Current Affairs | Vision IAS

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In Summary

  • सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा बनाम भारत संघ मामले में रोगी के सर्वोत्तम हित के सिद्धांत को लागू करते हुए निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी।
  • निष्क्रिय इच्छामृत्यु में जीवन रक्षक प्रणाली को रोकना/वापस लेना शामिल है; सक्रिय इच्छामृत्यु (घातक दवाओं के माध्यम से) भारत में अवैध है।
  • सुप्रीम कोर्ट ने संसद से जीवन के अंतिम चरण की देखभाल के लिए कानून बनाने का आग्रह किया और उच्च न्यायालयों को प्रशासनिक निर्देश जारी करने का निर्देश दिया।

In Summary

उच्चतम न्यायालय ने हरीश राणा बनाम भारत संघ वाद में अपने निर्णय में, 12 वर्षों से अधिक समय से वेजिटेटिव स्टेट (चेतनाहीन अवस्था) में पड़े एक व्यक्ति की कृत्रिम जीवन रक्षक प्रणाली (life support) को हटाने की अनुमति दी है। यह निर्णय 'मरीज के सर्वोत्तम हित के सिद्धांत' (Best Interest of the Patient Principle) के आधार पर लिया गया है।

  • न्यायालय ने सामान्य 30 दिनों की विचार अवधि की शर्त को हटा दिया, क्योंकि मरीज के माता-पिता और मेडिकल बोर्ड्स ने सर्वसम्मति से सहमति व्यक्त की थी कि मरीज के ठीक होने की कोई संभावना नहीं है।
  • इच्छामृत्यु (Euthanasia): यह रोगी की पीड़ा को समाप्त करने के लिए उसके जीवन का अंत करने की एक पद्धति है। इच्छामृत्यु के दो प्रकार हैं- सक्रिय इच्छामृत्यु (बॉक्स देखें) और निष्क्रिय इच्छामृत्यु। इसे केवल एक चिकित्सक द्वारा प्रशासित किया जा सकता है। 

सक्रिय इच्छामृत्यु (Active Euthanasia): 

  • इसमें चिकित्सक द्वारा जानबूझकर, आमतौर पर प्राणघातक दवाओं के माध्यम से, लाइलाज या गंभीर रूप से बीमार रोगी के जीवन को समाप्त करना शामिल है।
  • भारत में स्थिति: सक्रिय इच्छामृत्यु भारत में अवैध है।
  • नीदरलैंड और बेल्जियम जैसे देशों में यह कानूनी है।

 

निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia)

  • इसके तहत, जीवन को बनाए रखने वाले चिकित्सा उपचार को रोककर या वापस लेकर रोगी की प्राकृतिक रूप से मृत्यु होने दी जाती है। 
    • कानूनी स्थिति
      • अरुणा रामचंद्र शानबाग मामला (2011): उच्चतम न्यायालय ने इच्छामृत्यु की याचिका खारिज कर दी थी, लेकिन टर्मिनली इल और अपरिवर्तनीय रोगियों के लिए सख्त शर्तों के तहत 'निष्क्रिय इच्छामृत्यु' की अनुमति दी थी।
  • कॉमन कॉज़ निर्णय (2018): उच्चतम न्यायालय ने इसे मान्यता दी और कहा कि अनुच्छेद 21 के तहत गरिमा के साथ मरने का अधिकार एक मूल अधिकार है।
    • इस मामले में दिशा-निर्देश तय किए गए और 'लिविंग विल' (Living Will) की अवधारणा को मान्यता दी गई।
    • न्यायालय ने कहा कि 'एडवांस मेडिकल डायरेक्टिव्स' का उपयोग करके निष्क्रिय इच्छामृत्यु दी जा सकती है।
  • 2023 में जारी संशोधित दिशा-निर्देश: वेजिटेटिव स्टेट में मरीज की जीवन रक्षक प्रणाली को हटाने पर विशषेज्ञों की राय के लिए एक प्राथमिक और एक माध्यमिक मेडिकल बोर्ड का गठन करना अनिवार्य होगा।

निर्णय के अन्य मुख्य अंश

  • व्यापक कानून बनाना: न्यायालय ने संसद से जीवन का अंत संबंधी देखभाल (end-of-life care) और निष्क्रिय इच्छामृत्यु से संबंधित एक व्यापक व सुसंगत वैधानिक ढांचा बनाने का आग्रह किया।
  • प्रशासनिक निर्देश: भविष्य के मामलों की प्रक्रिया में सुधार के लिए, न्यायालय ने उच्च न्यायालयों को यह सुनिश्चित करने का निर्देश दिया कि जब भी मेडिकल बोर्ड जीवन रक्षक प्रणाली को हटाने का निर्णय लें, तो अस्पतालों द्वारा न्यायिक मजिस्ट्रेटों को सूचित किया जाए।
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End-of-life care

Comprehensive medical and supportive care provided to individuals who are nearing the end of their lives. It focuses on managing symptoms, providing comfort, and addressing the physical, emotional, and spiritual needs of the patient and their family.

Advance Medical Directives

Written instructions concerning a person's medical care preferences, including decisions about life-sustaining treatment, to be followed if they are no longer able to make those decisions themselves. Passive euthanasia can be carried out using these directives.

Living Will

An advance medical directive where an individual specifies their wishes regarding medical treatment, including life support, in the event they become incapacitated and unable to communicate. The Supreme Court of India has recognized the validity of living wills for passive euthanasia.

Title is required. Maximum 500 characters.

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