उच्चतम न्यायालय ने हरीश राणा बनाम भारत संघ वाद में अपने निर्णय में, 12 वर्षों से अधिक समय से वेजिटेटिव स्टेट (चेतनाहीन अवस्था) में पड़े एक व्यक्ति की कृत्रिम जीवन रक्षक प्रणाली (life support) को हटाने की अनुमति दी है। यह निर्णय 'मरीज के सर्वोत्तम हित के सिद्धांत' (Best Interest of the Patient Principle) के आधार पर लिया गया है।
- न्यायालय ने सामान्य 30 दिनों की विचार अवधि की शर्त को हटा दिया, क्योंकि मरीज के माता-पिता और मेडिकल बोर्ड्स ने सर्वसम्मति से सहमति व्यक्त की थी कि मरीज के ठीक होने की कोई संभावना नहीं है।
- इच्छामृत्यु (Euthanasia): यह रोगी की पीड़ा को समाप्त करने के लिए उसके जीवन का अंत करने की एक पद्धति है। इच्छामृत्यु के दो प्रकार हैं- सक्रिय इच्छामृत्यु (बॉक्स देखें) और निष्क्रिय इच्छामृत्यु। इसे केवल एक चिकित्सक द्वारा प्रशासित किया जा सकता है।
सक्रिय इच्छामृत्यु (Active Euthanasia):
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निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia)
- इसके तहत, जीवन को बनाए रखने वाले चिकित्सा उपचार को रोककर या वापस लेकर रोगी की प्राकृतिक रूप से मृत्यु होने दी जाती है।
- कानूनी स्थिति
- अरुणा रामचंद्र शानबाग मामला (2011): उच्चतम न्यायालय ने इच्छामृत्यु की याचिका खारिज कर दी थी, लेकिन टर्मिनली इल और अपरिवर्तनीय रोगियों के लिए सख्त शर्तों के तहत 'निष्क्रिय इच्छामृत्यु' की अनुमति दी थी।
- कानूनी स्थिति
- कॉमन कॉज़ निर्णय (2018): उच्चतम न्यायालय ने इसे मान्यता दी और कहा कि अनुच्छेद 21 के तहत गरिमा के साथ मरने का अधिकार एक मूल अधिकार है।
- इस मामले में दिशा-निर्देश तय किए गए और 'लिविंग विल' (Living Will) की अवधारणा को मान्यता दी गई।
- न्यायालय ने कहा कि 'एडवांस मेडिकल डायरेक्टिव्स' का उपयोग करके निष्क्रिय इच्छामृत्यु दी जा सकती है।
- 2023 में जारी संशोधित दिशा-निर्देश: वेजिटेटिव स्टेट में मरीज की जीवन रक्षक प्रणाली को हटाने पर विशषेज्ञों की राय के लिए एक प्राथमिक और एक माध्यमिक मेडिकल बोर्ड का गठन करना अनिवार्य होगा।
निर्णय के अन्य मुख्य अंश
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