उच्चतम न्यायालय ने आक्रामक और खतरनाक कुत्तों को इच्छामृत्यु की अनुमति देते हुए नए निर्देश जारी किए | Current Affairs | Vision IAS

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  • सुप्रीम कोर्ट ने सार्वजनिक स्थानों से आवारा कुत्तों को हटाने संबंधी निर्देशों को वापस लेने से इनकार कर दिया, यह स्पष्ट करते हुए कि वे 'गली के कुत्ते' नहीं हैं जिन्हें ऐसे क्षेत्रों पर कब्जा करने का अधिकार हो।
  • अदालत ने पागल/आक्रामक कुत्तों को इच्छामृत्यु देने की अनुमति दी, अधिकारियों को एफआईआर से बचाया, एनएचएआई को राजमार्गों से मवेशियों को हटाने का निर्देश दिया और जिलों में एबीसी केंद्र अनिवार्य कर दिए।
  • इच्छामृत्यु, संभावित दुरुपयोग, पशु अधिकारों और राज्य के अधिकार के बीच संघर्ष और कुत्तों के मनमाने वर्गीकरण के जोखिमों के संबंध में नैतिक चिंताएं उत्पन्न होती हैं।

In Summary

उच्चतम न्यायालय ने नवंबर 2025 में दिए गए अपने उस निर्देश को वापस लेने से इनकार कर दिया, जिसमें सार्वजनिक स्थलों (जैसे स्कूल, अस्पताल, रेलवे स्टेशन और हवाई अड्डे) से आवारा कुत्तों को पूरी तरह हटाने की बात कही गई थी।

  • शीर्ष न्यायालय ने स्पष्ट किया कि उपर्युक्त संस्थागत परिसरों में रहने वाले कुत्तों को पशु जन्म नियंत्रण (ABC) नियम, 2023 के तहत “स्ट्रीट डॉग” या “कम्युनिटी डॉग” नहीं माना जा सकता, इसलिए उन्हें वहां रहने का पूर्ण अधिकार नहीं है।
  • उच्चतम न्यायालय ने यह भी टिप्पणी की कि लोगों का ‘बिना डर के सार्वजनिक स्थलों पर घूमना’ भी संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मिलने वाले "प्राण और दैहिक स्वतंत्रता के अधिकार" का हिस्सा है। 

उच्चतम न्यायालय द्वारा जारी प्रमुख निर्देश:

  • इच्छामृत्यु की अनुमति: रेबीज से संक्रमित, लाइलाज बीमार, बेहद आक्रामक और लोगों के लिए खतरनाक साबित हो चुके कुत्तों को कानून के दायरे में रहकर इच्छामृत्यु (euthanasia) दी जा सकती है। 
  • अधिकारियों को कार्रवाई से संरक्षण: अपने कर्तव्यों का पालन करने वाले स्थानीय निकाय के अधिकारियों को FIR/आपराधिक शिकायतों से सुरक्षा दी गई है।
  • राजमार्गों की सुरक्षा: NHAI को राजमार्गों को आवारा पशुओं से सुरक्षित रखने का निर्देश दिया गया।
  • भारतीय पशु कल्याण बोर्ड (AWBI) के नियमों को लागू करना: राज्यों/संघ राज्य क्षेत्रों को 'भारतीय पशु कल्याण बोर्ड'  के नियमों को सख्ती से लागू करना होगा।
  • पशु जन्म नियंत्रण (ABC) केंद्र: प्रत्येक जिले में कम से कम एक पशु जन्म नियंत्रण (ABC) केंद्र स्थापित किया जाना चाहिए।
  • एंटी-रेबीज टीकों की आपूर्ति: पर्याप्त एंटी-रेबीज टीके और इम्यूनोग्लोबुलिन की उपलब्धता सुनिश्चित की जानी चाहिए।
  • न्यायालय द्वारा निगरानी: उच्च न्यायालय मामलों का 'स्वतः संज्ञान' लेते हुए निर्देशों के अनुपालन की निगरानी करेंगे।

आक्रामक और खतरनाक कुत्तों की इच्छामृत्यु की अनुमति देने से जुड़े नैतिक मुद्दे:

  • करुणा बनाम दया-मृत्यु: इस निर्देश का दुरुपयोग मानवीयता दर्शाने के अंतिम विकल्प के बजाय कुत्तों की संख्या को नियंत्रित रखने के आसान विकल्प के रूप में किया जा सकता है।
  • पशु अधिकार बनाम राज्य का प्राधिकार: नागरिकों की सुरक्षा करने का सरकार का कर्तव्य, 'पशुओं के जीवन, और क्रूर व्यवहार से मुक्त रहने के अधिकार' से टकरा सकता है।
    • उच्चतम न्यायालय ने 2014 के जल्लीकट्टू मामले में यह व्याख्या की कि ‘प्राण और दैहिक स्वतंत्रता का अधिकार’ (अनुच्छेद 21) के दायरे में पशु भी शामिल है।
  • मनमाने वर्गीकरण का जोखिम: किन कुत्तों को “खतरनाक” या “आक्रामक” माना जाए, इसका निर्णय पक्षपात, अधिकारों के दुरुपयोग और गलत तरीके से मार दिए जाने जैसी नैतिक चिंताएँ पैदा करता है।

इच्छामृत्यु के विकल्प:

  • विश्व के अन्य देशों के उदाहरण: इटली का “रैंडअजियामो (RandAgiamo)” प्रोजेक्ट आश्रय गृहों में रहने वाले वयस्क कुत्तों के लिए प्रशिक्षण, सामाजिक व्यवहार विकसित करने और उन्हें गोद दिलाने हेतु प्रचार-प्रसार की सुविधा प्रदान करता है।
  • अनिवार्य पंजीकरण और जिम्मेदार स्वामित्व की भूमिका निभाना: 'विश्व पशु स्वास्थ्य संगठन' के स्थलीय पशु स्वास्थ्य कोड का पालन करने के लिए ऐसा आवश्यक है।
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विश्व पशु स्वास्थ्य संगठन (OIE)

यह पशु रोगों के बारे में अंतरराष्ट्रीय जानकारी का प्रसार करने और पशु स्वास्थ्य मानकों को स्थापित करने वाला एक अंतर-सरकारी संगठन है। इसका 'स्थलीय पशु स्वास्थ्य कोड' (Terrestrial Animal Health Code) पशुओं के स्वास्थ्य और व्यापार से संबंधित दिशानिर्देश प्रदान करता है।

जल्लीकट्टू मामला (2014)

इस मामले में उच्चतम न्यायालय ने व्याख्या की कि अनुच्छेद 21 के तहत 'प्राण और दैहिक स्वतंत्रता का अधिकार' केवल मनुष्यों तक सीमित नहीं है, बल्कि पशुओं को भी इसके तहत कुछ हद तक संरक्षण प्राप्त है, जिससे उनके जीवन और कल्याण के अधिकार को मान्यता मिली।

स्वतः संज्ञान (Suo Motu)

यह वह स्थिति है जब कोई अदालत या न्यायाधिकरण किसी मामले पर स्वतः संज्ञान लेती है, अर्थात किसी पक्ष द्वारा याचिका दायर किए बिना, सार्वजनिक हित या किसी गंभीर मुद्दे को देखते हुए।

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