सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्री ने लोक सभा में यह विधेयक प्रस्तुत किया है। इसका उद्देश्य 'ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 2019' में महत्वपूर्ण बदलाव करके ट्रांसजेंडर समुदाय को बेहतर कानूनी सुरक्षा प्रदान करना है।
विधेयक की मुख्य विशेषताएं
- संशोधित परिभाषा: इसमें ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को उन लोगों के रूप में परिभाषित किया गया है, जिनकी सामाजिक-सांस्कृतिक पहचान है (जैसे- किन्नर, हिजड़ा, अरावनी, जोगता आदि) या जिनमें जैविक भिन्नताएं हैं। इसमें वे लोग भी शामिल हैं, जिन्हें जबरन ट्रांसजेंडर पहचान अपनाने के लिए मजबूर किया गया है (जैसे कि विकृति, हार्मोनल प्रक्रियाएं आदि के माध्यम से)।
- यह विधेयक स्व-अनुभूत लैंगिक पहचान (जैसे कि स्वयं को महिला के रूप में पहचानने वाले पुरुष) या यौन रुझानों (sexual orientation) को शामिल नहीं करता है।
- यह 2019 के अधिनियम की धारा 4(2) को हटाता है, जिससे 'आत्म-निर्णय' (self-determination) की कानूनी मान्यता समाप्त हो जाती है।
- सत्यापनकर्ता प्राधिकरण: ट्रांसजेंडर पहचान के सत्यापन में अधिकारियों की सहायता के लिए एक मेडिकल बोर्ड की स्थापना का प्रावधान किया गया है। इसकी अध्यक्षता मुख्य चिकित्सा अधिकारी (CMO) या डिप्टी CMO करेगा।
- 2019 के अधिनियम के तहत, कोई भी व्यक्ति बिना किसी चिकित्सा जांच के केवल अपनी स्व-अनुभूत पहचान के आधार पर जिला मजिस्ट्रेट से पहचान प्रमाण-पत्र प्राप्त कर सकता था।
- सख्त दंडात्मक प्रावधान: ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के खिलाफ अपराधों, जैसे दुर्व्यवहार, जबरन श्रम, अपहरण और जबरन ट्रांसजेंडर पहचान थोपने के लिए श्रेणीबद्ध दंड के प्रावधान किए गए हैं। इसमें आजीवन कारावास तक की सजा का भी प्रावधान है।
- ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के लिए राष्ट्रीय परिषद: परिषद की संरचना में बदलाव किया गया है, ताकि राज्य सरकारों और संघ राज्यक्षेत्रों का रोटेशन के आधार पर प्रतिनिधित्व सुनिश्चित किया जा सके।
- अन्य: पहचान प्रमाण-पत्र प्राप्त करने वाले व्यक्ति आधिकारिक दस्तावेजों में परिणामी परिवर्तन करवा सकते हैं आदि।
विधेयक का महत्व
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