उच्चतम न्यायालय ने महिलाओं और बच्चों के यौन दुर्व्यापार को रोकने के लिए दिशा-निर्देश जारी किए | Current Affairs | Vision IAS

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  • सुप्रीम कोर्ट ने मानव तस्करी को अनुच्छेद 23 के तहत संवैधानिक गरिमा पर हमला बताया है, जिसमें स्वैच्छिक यौन कार्य से सहमति को एक प्रमुख अंतर के रूप में रेखांकित किया गया है।
  • पलेर्मो प्रोटोकॉल के 'कार्रवाई, साधन और शोषण' ढांचे में मानव तस्करी को परिभाषित किया गया है, जिसमें अनुच्छेद 21 से पुनर्वास अधिकार प्राप्त होते हैं।
  • भारत के मानव तस्करी विरोधी ढांचे में बीएनएसएस 2023, बीएनएस 2023, आईटीपीए 1956 और एनआईए की जांच शामिल हैं, जिसमें 2024 में 6,018 पीड़ितों की रिपोर्ट दर्ज की गई।

In Summary

संविधान के अनुच्छेद 32 और 142 के तहत प्रदत्त अपनी शक्तियों का प्रयोग करते हुए, उच्चतम न्यायालय ने मानव दुर्व्यापार (ट्रैफिकिंग) को ‘संवैधानिक गरिमा पर प्रत्यक्ष आघात’ बताया जो सीधे तौर पर अनुच्छेद 23 का उल्लंघन है।

  • संविधान का अनुच्छेद 23 (शोषण के विरुद्ध अधिकार) मनुष्यों के दुर्व्यापार (तस्करी) और बलात श्रम पर पूरी तरह रोक लगाता है।

उच्चतम न्यायालय के मुख्य दिशा-निर्देश

  • सहमति का महत्व: न्यायालय ने निर्देश दिया कि यह तय करने में कि कोई मामला मानव दुर्व्यापार का है या स्वैच्छिक वयस्क यौन संबंध का, ‘सहमति’ प्रमुख विधिक आधार है। 
    • पुलिस और बचाव एजेंसियों को निर्देश दिया गया कि सहमति आधारित यौन संबंधों में शामिल संकटापन्न व्यक्तियों को अपराधी न माना जाए, ताकि मानव दुर्व्यापार-रोधी तंत्र का दुरुपयोग रोका जा सके। 
  • पालेर्मो प्रोटोकॉल के आधार पर मानव दुर्व्यापार के आवश्यक लक्षण: कार्य (Action), साधन (Means) और शोषण (Exploitation)। 
    • ‘व्यक्तियों के दुर्व्यापार की रोकथाम, दमन और दंड संबंधी संयुक्त राष्ट्र प्रोटोकॉल’, मानव दुर्व्यापार की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त परिभाषा प्रदान करने वाला पहला बाध्यकारी विधिक दस्तावेज है।
      • इस प्रोटोकॉल पर 2000 में इटली के पालेर्मो में हस्ताक्षर प्रारंभ हुआ था।
  • बाल संरक्षण और पुनर्वास: पुनर्वास का अधिकार प्रत्यक्ष रूप से संविधान के अनुच्छेद 21 में निहित है और 'गरिमा के साथ जीवन का अधिकार' (Right to live with dignity) का हिस्सा है। 
  • पीड़ित संरक्षण योजना: आश्रय गृहों में न्यूनतम मानक सुनिश्चित करने; मानसिक स्वास्थ्य सहायता, व्यावसायिक प्रशिक्षण और विधिक सहायता प्रदान करने तथा पीड़ितों को वापस समाज से जोड़ने के लिए उपाय करने चाहिए, आदि। 

भारत में मानव दुर्व्यापार की स्थिति 

  • वर्तमान स्थिति: राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) की 'भारत में अपराध 2024' रिपोर्ट के अनुसार, मानव दुर्व्यापार (तस्करी) के 6,018 मामलें दर्ज किए गए, जिनमें से 2,297 बच्चे थे।
  • मानव दुर्व्यापार रोकने के लिए तंत्र:
    • भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), 2023: इसमें मानव दुर्व्यापार को एक संज्ञेय (cognizable) और गैर-जमानती अपराध माना गया है।
    • भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023: 
      • धारा 143 मानव दुर्व्यापार की परिभाषा देती है, और 
      • धारा 144 दुर्व्यापार के शिकार व्यक्तियों के शोषण, जिसमें यौन शोषण भी शामिल है, से संबंधित प्रावधान करती है।
    • अनैतिक दुर्व्यापार (निवारण) अधिनियम, 1956 (ITPA): यह वेश्यावृत्ति और व्यावसायिक उद्देश्य से यौन शोषण के लिए व्यक्तियों के दुर्व्यापार को रोकता है।
    • राष्ट्रीय अन्वेषण अभिकरण (NIA): यह अंतरराज्यीय, राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर के मानव दुर्व्यापार के मामलों की जांच करता है। 
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गैर-जमानती अपराध

यह एक ऐसा गंभीर अपराध है जिसमें आरोपी को पुलिस या अदालत द्वारा आसानी से जमानत नहीं दी जा सकती। एसिड अटैक को गैर-जमानती अपराध बनाने से आरोपी को आसानी से रिहा होने से रोका जा सकता है।

संज्ञेय अपराध

एक संज्ञेय अपराध वह होता है जिसके लिए पुलिस बिना वारंट के गिरफ्तार कर सकती है और जिसके लिए जांच की अनुमति की आवश्यकता नहीं होती है। ललिता कुमारी मामले में एफआईआर दर्ज करना अनिवार्य था।

राष्ट्रीय अन्वेषण अभिकरण (NIA)

National Investigation Agency (NIA) is a central agency established by the Indian government to investigate terror-related crimes and other serious offenses affecting national security. It works to coordinate and empower effective investigation of terror crimes across states.

Title is required. Maximum 500 characters.

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