संविधान के अनुच्छेद 32 और 142 के तहत प्रदत्त अपनी शक्तियों का प्रयोग करते हुए, उच्चतम न्यायालय ने मानव दुर्व्यापार (ट्रैफिकिंग) को ‘संवैधानिक गरिमा पर प्रत्यक्ष आघात’ बताया जो सीधे तौर पर अनुच्छेद 23 का उल्लंघन है।
- संविधान का अनुच्छेद 23 (शोषण के विरुद्ध अधिकार) मनुष्यों के दुर्व्यापार (तस्करी) और बलात श्रम पर पूरी तरह रोक लगाता है।
उच्चतम न्यायालय के मुख्य दिशा-निर्देश
- सहमति का महत्व: न्यायालय ने निर्देश दिया कि यह तय करने में कि कोई मामला मानव दुर्व्यापार का है या स्वैच्छिक वयस्क यौन संबंध का, ‘सहमति’ प्रमुख विधिक आधार है।
- पुलिस और बचाव एजेंसियों को निर्देश दिया गया कि सहमति आधारित यौन संबंधों में शामिल संकटापन्न व्यक्तियों को अपराधी न माना जाए, ताकि मानव दुर्व्यापार-रोधी तंत्र का दुरुपयोग रोका जा सके।
- पालेर्मो प्रोटोकॉल के आधार पर मानव दुर्व्यापार के आवश्यक लक्षण: कार्य (Action), साधन (Means) और शोषण (Exploitation)।
- ‘व्यक्तियों के दुर्व्यापार की रोकथाम, दमन और दंड संबंधी संयुक्त राष्ट्र प्रोटोकॉल’, मानव दुर्व्यापार की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त परिभाषा प्रदान करने वाला पहला बाध्यकारी विधिक दस्तावेज है।
- इस प्रोटोकॉल पर 2000 में इटली के पालेर्मो में हस्ताक्षर प्रारंभ हुआ था।
- ‘व्यक्तियों के दुर्व्यापार की रोकथाम, दमन और दंड संबंधी संयुक्त राष्ट्र प्रोटोकॉल’, मानव दुर्व्यापार की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त परिभाषा प्रदान करने वाला पहला बाध्यकारी विधिक दस्तावेज है।
- बाल संरक्षण और पुनर्वास: पुनर्वास का अधिकार प्रत्यक्ष रूप से संविधान के अनुच्छेद 21 में निहित है और 'गरिमा के साथ जीवन का अधिकार' (Right to live with dignity) का हिस्सा है।
- पीड़ित संरक्षण योजना: आश्रय गृहों में न्यूनतम मानक सुनिश्चित करने; मानसिक स्वास्थ्य सहायता, व्यावसायिक प्रशिक्षण और विधिक सहायता प्रदान करने तथा पीड़ितों को वापस समाज से जोड़ने के लिए उपाय करने चाहिए, आदि।
भारत में मानव दुर्व्यापार की स्थिति
- वर्तमान स्थिति: राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) की 'भारत में अपराध 2024' रिपोर्ट के अनुसार, मानव दुर्व्यापार (तस्करी) के 6,018 मामलें दर्ज किए गए, जिनमें से 2,297 बच्चे थे।
- मानव दुर्व्यापार रोकने के लिए तंत्र:
- भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), 2023: इसमें मानव दुर्व्यापार को एक संज्ञेय (cognizable) और गैर-जमानती अपराध माना गया है।
- भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023:
- धारा 143 मानव दुर्व्यापार की परिभाषा देती है, और
- धारा 144 दुर्व्यापार के शिकार व्यक्तियों के शोषण, जिसमें यौन शोषण भी शामिल है, से संबंधित प्रावधान करती है।
- अनैतिक दुर्व्यापार (निवारण) अधिनियम, 1956 (ITPA): यह वेश्यावृत्ति और व्यावसायिक उद्देश्य से यौन शोषण के लिए व्यक्तियों के दुर्व्यापार को रोकता है।
- राष्ट्रीय अन्वेषण अभिकरण (NIA): यह अंतरराज्यीय, राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर के मानव दुर्व्यापार के मामलों की जांच करता है।