'किसान महापंचायत बनाम भारत संघ और अन्य' वाद में बिना किसी शुल्क के पीली दाल के आयात की अनुमति देने की नीति को चुनौती दी गई थी।
- किसान महापंचायत की ओर से तर्क दिया कि इस नीति ने दालों की घरेलू कीमतों को कम कर दिया और स्थानीय किसानों को दलहन की खेती करने से हतोत्साहित किया।
फसल विविधीकरण क्या है?
- फसल विविधीकरण का अर्थ है कि किसान अपने खेत में एक ही फसल उगाने की जगह नई फसलें या नई कृषि पद्धतियाँ शामिल करें, ताकि इन मूल्यवर्धित अलग-अलग फसलों को उगाने से अधिक लाभ मिल सके और उन्हें बाजार में बेचने के बेहतर अवसर मिलें।
फसल विविधीकरण की आवश्यकता

- गेहूं और धान की अधिक खेती: मौजूदा नीतियों और प्रथाओं के परिणामस्वरूप गेहूं और धान का अधिशेष उत्पादन हुआ है। इससे दलहन और तिलहन के उत्पादन पर प्रभाव पड़ा है और इनका आयात करना पड़ता है।
- पर्यावरण पर प्रभाव: विशेषकर उत्तर भारत में धान-गेहूं फसल चक्र के कारण भूजल स्तर और मृदा की गुणवत्ता में गिरावट दर्ज की गई है।
- पोषण सुरक्षा: फसल विविधीकरण से संतुलित आहार में दलहन का उपभोग बढ़ाया जा सकता है।
- मृदा स्वास्थ्य: दलहन नाइट्रोजन स्थिरीकरण करने वाली फसलें हैं, जो मृदा की उर्वरता बढ़ाती हैं और रासायनिक उर्वरकों की आवश्यकता को कम करती हैं।
फसल विविधीकरण की मुख्य चुनौतियां
- प्रोत्साहनकारी MSP का अभाव: इसके कारण दलहन खुले बाजार में न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) से कम कीमत पर बिकती है, जिससे किसानों के लिए इसकी खेती आकर्षक नहीं रहती।
- MSP और आयात नीतियों में असंगति: सरकार किसानों की आय बढ़ाने के लिए दालों पर अधिक MSP देती है। लेकिन बिना शुल्क या कम शुल्क पर आयात होने से बाजार में अधिक आपूर्ति हो जाती है। इससे कीमतें गिरकर MSP से नीचे चली जाती हैं। यह फसल विविधीकरण की आर्थिक व्यवहार्यता को प्रभावित करता है।
- अन्य चुनौतियां: अवसंरचना की कमी, कृषि संसाधनों और जागरूकता की कमी, पूंजी की कमी और जोखिम उठाने की सीमित क्षमता, जलवायु संबंधी कारक, तकनीकी ज्ञान का अभाव, आदि।
उच्चतम न्यायालय के प्रमुख सुझाव
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