अंतरिक्ष से पृथ्वी पर वापस आना एक जटिल तकनीकी प्रक्रिया है। इसमें अंतरिक्ष यान की गति और प्रवेश कोण (एंट्री एंगल) की सटीक गणना बहुत जरूरी है।
पृथ्वी पर वापसी प्रक्रिया के प्रमुख चरण
- पृथ्वी के वायुमंडल में पुनः प्रवेश (डी-ऑर्बिट बर्न प्रक्रिया): अंतरिक्ष यान अपनी गति कम करने के लिए इंजनों को उल्टी दिशा में चलाता है, जिससे पृथ्वी का गुरुत्वाकर्षण उसे वायुमंडल की ओर खींचता है।
- कैप्सूल पुनः प्रवेश के दौरान अत्यधिक तापमान को सहने के लिए हीट शील्ड (ऊष्मारोधी कवच) का उपयोग करता है।
- पैराशूट का उपयोग: यह प्राकृतिक ब्रेक की तरह कार्य करता है, जिससे कैप्सूल धीरे-धीरे नीचे उतरता है।
- इसके बाद कैप्सूल या तो जमीन पर या समुद्र में (स्प्लैशडाउन) उतरता है।
वायुमंडलीय पुनः प्रवेश के दौरान प्रमुख चुनौतियां
- सटीक प्रवेश कोण प्राप्त करना: उतरते समय सही कोण और गति का सटीक निर्धारण करना अंतरिक्ष यात्रियों की सुरक्षा के लिए बहुत जरूरी होता है।
- यदि कोण बहुत अधिक सीधा (सटीक ऊर्ध्वाधर) हो, तो घर्षण के कारण अंतरिक्ष यान पुनः प्रवेश के समय पूरी तरह जल सकता है, जिससे उसमें सवार सभी यात्रियों की मृत्यु हो सकती है।
- उच्च तापमान को सहन करना: अंतरिक्ष यान के पास से गुजरती हवा अत्यधिक घर्षण उत्पन्न करती है। तापमान आसानी से 1600°C से अधिक हो सकता है—जो स्टील को पिघलाने के लिए पर्याप्त है। तापमान लगभग 4000°C तक भी पहुंच सकता है।
- अंतरिक्ष यान की उच्च गति को धीमा करना: वायुमंडल में पुनः प्रवेश से पहले अंतरिक्ष यान ध्वनि की गति से कहीं अधिक तेज चलता है। इसकी गति 17,500 मील प्रति घंटा से 25,000 मील प्रति घंटा तक होती है।
- संचार में बाधा: अत्यधिक गर्मी हवा को आयनित करके कैप्सूल के चारों ओर प्लाज्मा की एक परत बना देती है। यह एक धातु जैसी परत की तरह काम करती है, जो रेडियो सिग्नलों को रोक देती है, जिससे कुछ समय के लिए संचार बंद हो जाता है।
अंतरिक्ष यात्रियों को पृथ्वी पर सुरक्षित वापस लाने की इसरो की क्षमताएं
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