कॉरपोरेट कानून (संशोधन) विधेयक लोकसभा में पेश किया गया | Current Affairs | Vision IAS

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इस विधेयक का उद्देश्य सीमित दायित्व भागीदारी अधिनियम (Limited Liability Partnership Act), 2008 और कंपनी अधिनियम, 2013 में संशोधन करना है। यह विधेयक व्यवसाय करना आसान बनाने और नियमों के अनुपालन के बोझ को कम करने के लिए लाया गया है।

विधेयक की आवश्यकता

  • व्यवसाय करना आसान बनाने के लिए: इसके लिए एक व्यक्ति वाली कंपनियों, लघु कंपनियों, स्टार्टअप कंपनियों और उत्पादक कंपनियों के लिए प्रक्रियाओं को सरल और अनुपालन को सुविधाजनक बनाया गया है।
  • निवेश आकर्षित करने के लिए: बदलते वित्तीय परिवेश के अनुरूप विनियामकीय व्यवस्था को संशोधित किया गया है और बेहतर कॉरपोरेट गवर्नेंस को बढ़ावा दिया गया है।
  • नियमों के सरलीकरण हेतु: अस्पष्टताओं को दूर किया गया है। साथ ही, नियमों के अनुपालन की शर्तों, जैसे कि व्यवसाय की पुनर्संरचना और व्यवसाय से निकास की प्रक्रियाओं को तर्कसंगत बनाकर परिचालन दक्षता में सुधार किया गया है। 

विधेयक के प्रमुख प्रावधान

  • कॉर्पोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व (CSR) में ढील: लघु कंपनियों पर बोझ कम करने के लिए CSR खर्च को अनिवार्य करने वाली लाभ सीमा (profit threshold) को दोगुना करके ₹10 करोड़ करने का प्रस्ताव किया गया है।
  • राष्ट्रीय वित्तीय रिपोर्टिंग प्राधिकरण (NFRA)NFRA को कॉरपोरेट का दर्जा दिया जाएगा। साथ ही, निवेशकों के हित में लेखा-परीक्षकों को निर्देश जारी करने के लिए इसके न्यायिक अधिकारों का विस्तार किया गया है।
  • शेयर बायबैक और फास्ट-ट्रैक विलय: निर्दिष्ट कंपनियों को एक ही वर्ष में अधिकतम दो बार शेयर बायबैक करने की अनुमति होगी, जिसमें न्यूनतम छह महीने का अंतराल आवश्यक होगा।
  • कई उल्लंघनों को गैर-आपराधिक बनाया गया: कॉरपोरेट से जुड़े छोटे अपराधों को अपराध की श्रेणी से हटा दिया गया है। इसकी जगह मौद्रिक दंड लगाने का प्रावधान किया गया है।
  • ट्रस्ट का रूपांतरण: विधेयक में एक नया संरचनात्मक फ्रेमवर्क का प्रावधान है। यह कुछ निर्दिष्ट ट्रस्टों को सीधे सीमित देयता भागीदारी  (LLPs) में परिवर्तित होने की अनुमति देता है। ऐसे ट्रस्टों में SEBI या IFSCA के यहां पंजीकृत वैकल्पिक निवेश कोष शामिल हैं। 
    • सीमित देयता भागीदारी  (LLPs) में साझेदारी की ऐसी संरचना होती है जिसमें प्रत्येक साझेदार की देनदारी उसके द्वारा व्यवसाय में लगाए गए निवेश तक सीमित होती है।
  • लेखा-परीक्षा: कुछ श्रेणी की लघु कंपनियों को अनिवार्य लेखा-परीक्षा (ऑडिट) आवश्यकताओं से छूट दी गई है। इसके लिए टर्नओवर की सीमा बाद में निर्धारित की जाएगी।

विधेयक से जुड़ी कुछ चिंताएं

  • यह विधेयक कॉर्पोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व (CSR) से संबंधित वर्तमान प्रावधानों को कमजोर करता है।  
  • विधायिका और कार्यपालिका के बीच संवैधानिक संतुलन को प्रभावित करता है, और 
  • संसद द्वारा निगरानी को कम करता है।

उपर्युक्त चिंताओं को देखते हुए इस विधेयक को विस्तृत परिचर्चा के लिए संयुक्त संसदीय समिति (JPC) को भेजा गया है। 

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संयुक्त संसदीय समिति (JPC)

एक संसदीय समिति जो किसी विधेयक को अधिक विस्तार से जांचने के लिए बुलाई जाती है। इसमें दोनों सदनों (लोकसभा और राज्यसभा) के सदस्य शामिल होते हैं और यह विधेयक पर अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत करती है।

लेखा-परीक्षा (Audit)

यह किसी संगठन के वित्तीय विवरणों की एक स्वतंत्र जांच है ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि वे सही और निष्पक्ष रूप से प्रस्तुत किए गए हैं और प्रासंगिक लेखांकन मानकों के अनुरूप हैं।

IFSCA (International Financial Services Centres Authority)

यह भारत में वित्तीय सेवा प्रदाताओं को नियंत्रित करने वाली एक एकीकृत नियामक संस्था है, विशेष रूप से अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय सेवा केंद्रों (IFSCs) में। यह वैश्विक वित्तीय बाजारों में भारत की प्रतिस्पर्धात्मकता को बढ़ावा देती है।

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