मध्य पूर्व संघर्ष वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए एक संरचनात्मक जोखिम उत्पन्न करने के साथ-साथ वैश्विक कमोडिटी बाजारों, औद्योगिक आपूर्ति श्रृंखलाओं, वित्तीय परिस्थितियों और भू-राजनीतिक समीकरणों के प्रमुख पहलुओं को पुनः आकार दे रहा है।
संघर्ष के प्रमुख प्रभाव
- शिपिंग मार्ग: होर्मुज जलडमरूमध्य से होकर वस्तुओं की आपूर्ति बाधित हो रही है। यह ईरान और ओमान के बीच एक संकरा समुद्री मार्ग है। यह कमोडिटी के आवागमन के लिए एक चोकपॉइंट है।
- औद्योगिक आपूर्ति श्रृंखलाएं: उदाहरण के लिए, हीलियम सेमीकंडक्टर विनिर्माण, मेडिकल इमेजिंग और अन्य उच्च-प्रौद्योगिकी उपयोगों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। युद्ध की वजह से कतर में इसका उत्पादन प्रभावित हुआ है। गौरतलब है कि हीलियम के निर्यात में कतर का लगभग एक-तिहाई योगदान है।
- वैश्विक खाद्य प्रणाली: खाड़ी क्षेत्र यूरिया, अमोनिया, सल्फर और अन्य उर्वरकों की आपूर्ति का एक प्रमुख केंद्र है।
- भारत उर्वरक उत्पादन में उपयोग होने वाली LNG (द्रवीकृत प्राकृतिक गैस) के आयात पर बहुत अधिक निर्भर है।
- भौगोलिक क्षेत्रों में असमान प्रभाव: संयुक्त राज्य अमेरिका होर्मुज जलडमरूमध्य के माध्यम से तेल का कम आयात करता है। वहीं इस युद्ध का खामियाजा एशियाई अर्थव्यवस्थाओं को अधिक झेलना पड़ रहा है। ऐसा इसलिए क्योंकि 2024 में होर्मुज जलडमरूमध्य से होकर भेजे गए तेल और LNG (द्रवीकृत प्राकृतिक गैस) का 80% से अधिक हिस्सा एशियाई बाजारों में गया था।
- आर्थिक नीतियों पर प्रभाव: स्टैगफ्लेशन यानी मुद्रास्फीतिजनित मंदी का खतरा बढ़ रहा है। तेल की उच्च या बढ़ती कीमतें मुद्रास्फीति में वृद्धि करती हैं और विकास की गति को धीमा करती हैं। ऐसी परिस्थितियों को मौद्रिक नीति उपायों के माध्यम से नियंत्रित करना कठिन हो जाता है।
वर्तमान मध्य-पूर्व संघर्ष ने यह स्पष्ट कर दिया है कि खाड़ी क्षेत्र एक सामरिक मंच है जहाँ आर्थिक, राजनीतिक और सामाजिक हित परस्पर जुड़े हुए हैं। ऐसे संकटों से निपटने के लिए विविध साझेदारियों और लचीली कूटनीति की आवश्यकता है।