भारत और ईरान के बीच ऐतिहासिक और सभ्यतागत संबंध रहे हैं | Current Affairs | Vision IAS

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In Summary

  • भारत पर ईरानी प्रभाव कला, वास्तुकला और प्रशासन में स्पष्ट रूप से दिखाई देता है, जिसमें साइरस और डेरियस प्रथम जैसे प्रमुख आक्रमणकारियों ने प्रारंभिक संबंध स्थापित किए थे।
  • फारसी प्रशासन मौर्य साम्राज्य के लिए एक आदर्श के रूप में कार्य करता था और प्रभावशाली बना रहा, जिसमें 1830 के दशक तक फारसी आधिकारिक भाषा थी।
  • भारतीय साहित्य, कला (लघु चित्रकला), वास्तुकला (चारबाग उद्यान, हुमायूं का मकबरा), संगीत और आध्यात्मिक प्रथाओं में फारसी प्रभाव स्पष्ट रूप से दिखाई देता है।

In Summary

भारत और ईरान के बीच संबंध अत्यंत प्राचीन और मजबूत रहे हैं। ईरानी संपर्क भारत के लिए अत्यंत प्रभावकारी सिद्ध हुआ है। इसका प्रभाव कला, स्थापत्य, साहित्य और प्रशासन के प्रमुख क्षेत्रों में स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है।

द्विपक्षीय संबंधों की नींव रखने वाले प्रमुख फारसी आक्रमणकारी

  • सायरस (558 – 530 ईसा पूर्व): हखामनी साम्राज्य का महानतम विजेता, जिसने भारत पर पहला अभियान चलाया और गांधार क्षेत्र पर कब्जा कर भारत में प्रवेश किया।
  • डेरियस प्रथम (522 – 486 ईसा पूर्व): सायरस का पोता, जिसने 518 ईसा पूर्व में सिंधु घाटी को जीता और पंजाब एवं सिंध को अपने साम्राज्य में मिला लिया।

प्रमुख क्षेत्रों पर फारसी प्रभाव

  • प्रशासन: जब चंद्रगुप्त मौर्य ने प्रथम भारतीय साम्राज्य की स्थापना की, तब हखामनी शासन प्रणाली ने एक मॉडल के रूप में कार्य किया।
    • यह प्रभाव ईस्ट इंडिया कंपनी के समय में भी बना रहा। ईस्ट इंडिया कंपनी ने 1832-37 के प्रशासनिक सुधारों तक फारसी को कानून और नौकरशाही की राजकीय भाषा के रूप में बनाए रखा।
  •  साहित्य: 
    • भारत का प्राचीनतम पवित्र ग्रंथ ऋग्वेद और ईरान के पारसी धर्म ग्रंथ अवेस्ता में समानताएं हैं।
    • अकबर (1582) के समय फारसी राजकीय या दरबारी भाषा बनी।
    • हिंदी में बड़ी संख्या में फारसी शब्द मिल जाते हैं, जैसे: कागज, रसीद, वकील, दीवानी, तहसील, मोहल्ला, आदि।
  • कला: मुगलों के समय फारसी लघु चित्रकारी या मिनिएचर पेंटिंग का प्रवेश हुआ।
    • हुमायूँ ने प्रसिद्ध फारसी कलाकार अब्दुस समद और मीर सैय्यद अली को अपने दरबार में आमंत्रित किया था।
  •  स्थापत्य: 
    • मौर्य काल: खरोष्ठी लिपि (ईरानी लेखन का एक रूप) उत्तर-पश्चिम भारत में प्रचलित हुई।
      • अशोक के अभिलेखों की परंपरा और भाषा में भी ईरानी प्रभाव देखा जाता है।
    • मुगल काल: फारसी उद्यान निर्माण शैली ने प्रसिद्ध "चारबाग" शैली को प्रेरित किया। इस शैली में बाग़ को चार हिस्सों में बांटा जाता है और बीच में पानी की नहरें या फव्वारे होते हैं। 
      • हुमायूँ का मकबरा और ताजमहल जैसे स्मारकों में फारसी प्रभाव स्पष्ट रूप से देखे जा सकते हैं।
  • अन्य क्षेत्रों पर प्रभाव: 
    • संगीत: सितार, संतूर जैसे वाद्ययंत्र; कव्वाली और ग़ज़ल जैसी शैलियाँ।
    • आध्यात्मिक परंपराएं: सूफी परंपरा का प्रसार।  
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सूफी परंपरा

इस्लाम का एक रहस्यवादी आंदोलन जिसका प्रसार भारत में हुआ और जिसमें फारसी संस्कृति का महत्वपूर्ण योगदान रहा।

चारबाग शैली

फारसी उद्यान निर्माण की एक शैली, जिसे मुगल काल में अपनाया गया, जिसमें बाग को चार हिस्सों में बाँटा जाता है और बीच में जल तत्व होते हैं। ताजमहल जैसे स्मारकों में इसका प्रभाव दिखता है।

खरोष्ठी लिपि

एक ईरानी लेखन प्रणाली जो मौर्य काल में उत्तर-पश्चिम भारत में प्रचलित हुई, जो ईरानी प्रभाव का एक महत्वपूर्ण प्रमाण है।

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