भारत और ईरान के बीच संबंध अत्यंत प्राचीन और मजबूत रहे हैं। ईरानी संपर्क भारत के लिए अत्यंत प्रभावकारी सिद्ध हुआ है। इसका प्रभाव कला, स्थापत्य, साहित्य और प्रशासन के प्रमुख क्षेत्रों में स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है।
द्विपक्षीय संबंधों की नींव रखने वाले प्रमुख फारसी आक्रमणकारी
- सायरस (558 – 530 ईसा पूर्व): हखामनी साम्राज्य का महानतम विजेता, जिसने भारत पर पहला अभियान चलाया और गांधार क्षेत्र पर कब्जा कर भारत में प्रवेश किया।
- डेरियस प्रथम (522 – 486 ईसा पूर्व): सायरस का पोता, जिसने 518 ईसा पूर्व में सिंधु घाटी को जीता और पंजाब एवं सिंध को अपने साम्राज्य में मिला लिया।
प्रमुख क्षेत्रों पर फारसी प्रभाव
- प्रशासन: जब चंद्रगुप्त मौर्य ने प्रथम भारतीय साम्राज्य की स्थापना की, तब हखामनी शासन प्रणाली ने एक मॉडल के रूप में कार्य किया।
- यह प्रभाव ईस्ट इंडिया कंपनी के समय में भी बना रहा। ईस्ट इंडिया कंपनी ने 1832-37 के प्रशासनिक सुधारों तक फारसी को कानून और नौकरशाही की राजकीय भाषा के रूप में बनाए रखा।
- साहित्य:
- भारत का प्राचीनतम पवित्र ग्रंथ ऋग्वेद और ईरान के पारसी धर्म ग्रंथ अवेस्ता में समानताएं हैं।
- अकबर (1582) के समय फारसी राजकीय या दरबारी भाषा बनी।
- हिंदी में बड़ी संख्या में फारसी शब्द मिल जाते हैं, जैसे: कागज, रसीद, वकील, दीवानी, तहसील, मोहल्ला, आदि।
- कला: मुगलों के समय फारसी लघु चित्रकारी या मिनिएचर पेंटिंग का प्रवेश हुआ।
- हुमायूँ ने प्रसिद्ध फारसी कलाकार अब्दुस समद और मीर सैय्यद अली को अपने दरबार में आमंत्रित किया था।
- स्थापत्य:
- मौर्य काल: खरोष्ठी लिपि (ईरानी लेखन का एक रूप) उत्तर-पश्चिम भारत में प्रचलित हुई।
- अशोक के अभिलेखों की परंपरा और भाषा में भी ईरानी प्रभाव देखा जाता है।
- मुगल काल: फारसी उद्यान निर्माण शैली ने प्रसिद्ध "चारबाग" शैली को प्रेरित किया। इस शैली में बाग़ को चार हिस्सों में बांटा जाता है और बीच में पानी की नहरें या फव्वारे होते हैं।
- हुमायूँ का मकबरा और ताजमहल जैसे स्मारकों में फारसी प्रभाव स्पष्ट रूप से देखे जा सकते हैं।
- मौर्य काल: खरोष्ठी लिपि (ईरानी लेखन का एक रूप) उत्तर-पश्चिम भारत में प्रचलित हुई।
- अन्य क्षेत्रों पर प्रभाव:
- संगीत: सितार, संतूर जैसे वाद्ययंत्र; कव्वाली और ग़ज़ल जैसी शैलियाँ।
- आध्यात्मिक परंपराएं: सूफी परंपरा का प्रसार।